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Wednesday, April 16, 2025

अमेठी जिले ने निपुण अस्सेस्मेंट 2024-25 में प्रदेश में पहला स्थान हासिल किया

 



👉हीट-वेव से बचाव हेतु बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा निर्गत एडवाइजरी व आवश्यक कार्यवाही कराये जाने के संबंध में

           https://www.updatemarts.com/2025/04/blog-post_279.html


अमेठी जिले ने शिक्षा के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की है। निपुण अस्सेस्मेंट टेस्ट 2024-25 में अमेठी ने प्रदेश भर में पहला स्थान हासिल किया है। यह उपलब्धि जिले के शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों की मेहनत का परिणाम है। पिछले सत्र 2022-23 में अमेठी जिले ने 59वां स्थान प्राप्त किया था, लेकिन इस बार जिले ने ऐतिहासिक छलांग लगाते हुए पहला स्थान हासिल किया।

इस सत्र में अमेठी जिले के कुल 1600 स्कूलों के 133410 बच्चों ने निपुण अस्सेस्मेंट टेस्ट में भाग लिया। इस बार जिले का प्रदर्शन पिछले वर्ष से काफी बेहतर रहा। पिछले सत्र में अमेठी का प्रतिशत 68.01 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 96.4 प्रतिशत हो गया है। यह एक बड़ा सुधार है और इसका श्रेय शिक्षकों की निरंतर मेहनत और बच्चों की लगन को जाता है।

ग्रेड ए में आने वाले बच्चों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। पिछले सत्र में 23.01 प्रतिशत बच्चे ग्रेड ए में थे, जबकि इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 53.04 प्रतिशत तक पहुँच गया है। यह दिखाता है कि बच्चों ने बेहतर प्रदर्शन किया है और उनकी मेहनत का फल उन्हें मिल रहा है।

इस बार प्रदेश स्तर पर हमीरपुर ने दूसरा स्थान प्राप्त किया और हापुड़ ने तीसरा स्थान हासिल किया। पिछली बार अमेठी ने 42वां स्थान प्राप्त किया था, जबकि इस बार उसने एक ऐतिहासिक छलांग लगाई और पहले स्थान पर पहुँच गया। यह बदलाव जिले के शैक्षिक माहौल में सुधार का संकेत है।

हालांकि, कुछ जिले इस बार पिछड़ गए हैं। अयोध्या जिला इस बार 64वें स्थान पर लुड़क गया है, जबकि सुल्तानपुर भी पिछली बार की 17वीं रैंक से फिसलकर 62वें स्थान पर पहुँच गया है। यह साबित करता है कि शैक्षिक गुणवत्ता में निरंतर सुधार की आवश्यकता है और यह किसी एक साल की मेहनत से नहीं हो सकता, बल्कि इसे निरंतर बनाए रखना होता है।

अमेठी जिले की यह सफलता केवल बच्चों की मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि शिक्षकों के निरंतर प्रशिक्षण, स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और अभिभावकों के सहयोग का भी परिणाम है। शिक्षकों को लगातार प्रशिक्षण दिया गया, जिससे वे बच्चों के लिए बेहतर शिक्षण पद्धतियाँ अपना सके। इसके अलावा, विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण की प्रक्रिया को लागू किया गया, जिसका परिणाम आज हम देख रहे हैं।

आने वाले समय में इस सफलता को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे। अमेठी जिले के शिक्षा विभाग ने यह संकल्प लिया है कि बच्चों की शिक्षा में सुधार और गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए निरंतर मेहनत की जाएगी। शिक्षकों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ उनके काम की निगरानी भी की जाएगी, ताकि बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी न रहे।

अमेठी की इस सफलता से अन्य जिलों को भी प्रेरणा मिलनी चाहिए। यह दिखाता है कि अगर समर्पण, मेहनत और सही मार्गदर्शन हो, तो किसी भी जिले को उच्च स्थान प्राप्त किया जा सकता है। यह सफलता जिले के सभी शिक्षा अधिकारियों, शिक्षकों और अभिभावकों के सामूहिक प्रयास का परिणाम है।

अब अमेठी जिले को इस सफलता को बनाए रखते हुए और भी बेहतर करने की चुनौती मिलेगी। बच्चों की शिक्षा में सुधार, शिक्षकों की गुणवत्ता और स्कूलों में सुविधाओं का सुधार अब अमेठी के लिए प्राथमिकता बनेगा। जिले को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों का प्रदर्शन इस स्तर पर बनाए रखा जाए और आगे और भी अच्छे परिणाम प्राप्त किए जाएं।

इस सफलता के बाद अब अमेठी जिले में शिक्षा का माहौल और भी बेहतर होगा। बच्चों को अब और भी अच्छे शिक्षक मिलेंगे, उनके लिए बेहतर सुविधाएँ होंगी और वे शिक्षा के क्षेत्र में और भी ऊँचाइयाँ छू सकेंगे। यह एक नई शुरुआत है, जो जिले की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है।

अमेठी की सफलता से यह भी सीखने को मिलता है कि शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए केवल बच्चों की मेहनत ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की मेहनत और निरंतर प्रशिक्षण भी जरूरी है। जब शिक्षक बच्चों के लिए बेहतर तरीकों से पढ़ाते हैं और बच्चों में पढ़ाई के प्रति उत्साह होता है, तो अच्छा परिणाम आता है।

इस सफलता को देखकर अन्य जिलों को भी यह प्रेरणा मिलनी चाहिए कि वे भी अपनी शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाकर अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। अगर हर जिला अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए काम करे, तो देशभर में शिक्षा का स्तर ऊँचा हो सकता है और बच्चों का भविष्य उज्जवल हो सकता है।

अमेठी जिले की यह सफलता एक प्रेरणा है, जो यह साबित करती है कि अगर सही दिशा में काम किया जाए और सभी लोग मिलकर प्रयास करें, तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।


👉वित्तीय वर्ष 2025-26 में आयकर अग्रिम कटौती वेतन से प्रति माह किये जाने के सम्बन्ध में

             https://www.updatemarts.com/2025/04/2025-26_16.html

ए.आर.पी. को औचक निरीक्षण एवं निरीक्षण पंजिका में अंकन का अधिकार नहीं

https://www.updatemarts.com/2025/04/blog-post_345.html




Tuesday, April 8, 2025

एक प्याला पानी, एक नई जिंदगी — गर्मी में पक्षियों की प्यास बुझाएँ


गर्मी का मौसम हर साल आता है। सूरज बहुत तेज़ चमकता है, ज़मीन तपने लगती है और लू चलने लगती है। ऐसे में हम सबको बहुत प्यास लगती है, बार-बार ठंडा पानी पीने का मन करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे आसपास जो पक्षी रहते हैं, वो इस गर्मी में क्या करते होंगे?

जैसे हम इंसान गर्मी में परेशान हो जाते हैं, वैसे ही गौरैया, बुलबुल, मैना, कबूतर जैसे पक्षी भी बहुत परेशान होते हैं। उन्हें भी प्यास लगती है, लेकिन वो तो दुकानों से पानी की बोतल नहीं खरीद सकते। वो तो सिर्फ वही पानी पी सकते हैं जो उन्हें आस-पास कहीं मिल जाए — जैसे कोई तालाब, पेड़ के नीचे का गड्ढा या कोई साफ बर्तन।

आजकल शहरों में तालाब और झीलें बहुत कम हो गई हैं। पेड़ों की संख्या भी घट गई है। ऊपर से गर्मी में जो थोड़े बहुत जलस्रोत होते हैं, वो भी सूख जाते हैं। इसलिए पक्षियों को बहुत मुश्किल होती है।

क्या आपने गौर किया है कि अब आपके घर की बालकनी या आँगन में पहले जितने पक्षी आते थे, उतने अब नहीं आते? गौरैया, जो कभी हर घर की पहचान हुआ करती थी, अब बहुत कम दिखती है।

इसके कई कारण हैं। हमने अपने घरों में उनके लिए पानी और दाना रखना बंद कर दिया। पेड़ काट दिए, जहाँ वो बैठा करती थीं या घोंसला बनाती थीं। मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों से भी उन्हें नुकसान पहुँचता है। और सबसे बड़ी बात — हमने उनके लिए समय और ध्यान देना छोड़ दिया।

गर्मी के दिनों में तापमान 40 डिग्री से भी ऊपर चला जाता है। ऐसे में पानी की कमी बहुत बढ़ जाती है। पक्षी इधर-उधर उड़ते हैं, लेकिन जब कहीं भी पानी नहीं मिलता तो कई बार वो प्यास से मर भी जाते हैं।

अब सोचिए, अगर हम सब अपने घर की बालकनी, खिड़की, आँगन या छत पर एक छोटा सा बर्तन रख दें, जिसमें साफ पानी हो — तो कितने पक्षियों की जान बच सकती है। ये एक बहुत छोटा काम है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा होता है।

पानी के साथ-साथ अगर हम कुछ दाना भी रख दें — जैसे चावल, बाजरा, ज्वार या टूटे हुए गेहूं — तो पक्षियों को पीने के बाद खाने को भी मिल जाएगा। गर्मी में दाना ढूंढना भी मुश्किल हो जाता है। ज़मीन सूख जाती है, खेतों में फसल नहीं होती। ऐसे में हमारी मदद उनके लिए एक पूरा भोजन बन जाती है।

इसके लिए बर्तन का चुनाव भी ध्यान से करना चाहिए। मिट्टी, स्टील या सिरेमिक के बर्तन सबसे अच्छे होते हैं क्योंकि ये पानी को ठंडा रखते हैं। प्लास्टिक के बर्तन बहुत गरम हो जाते हैं, इसलिए उन्हें न रखें।

हर दो-तीन दिन में बर्तन को अच्छे से धोना चाहिए और उसमें ताज़ा पानी भरना चाहिए, ताकि पानी दूषित न हो और पक्षियों को कोई बीमारी न हो।

बर्तन को ऐसी जगह रखें जहाँ धूप सीधी न पड़े और पक्षी आराम से बैठ सकें — जैसे छत का कोना, बालकनी, खिड़की की मुंडेर या आँगन का कोई कोना।

थोड़ा सा दाना रोज़ रखना चाहिए। इसे ज़मीन पर या किसी तश्तरी में फैलाकर रख सकते हैं ताकि पक्षी आराम से चुग सकें। अगर घर में पेड़ हैं, तो वहाँ पानी रख सकते हैं ताकि पक्षी शाखाओं पर बैठकर आराम से पानी पी सकें।

कुछ लोग सोचते हैं कि यह सेवा या दान है, लेकिन यह तो संवेदना है, यानी दिल से जुड़ा हुआ एक अच्छा काम। हम सब एक ही धरती पर रहते हैं — इंसान, जानवर, पक्षी और पेड़-पौधे। अगर हम अपने आस-पास के जीवों का ध्यान नहीं रखेंगे, तो यह धरती सूनी और बेरंग हो जाएगी।

बच्चे इस काम में बहुत आगे आ सकते हैं। स्कूलों में पोस्टर बनाकर या ड्रॉइंग बनाकर इस विषय को दिखाया जा सकता है। स्कूल में भी पक्षियों के लिए पानी रखने की जगह बनाई जा सकती है। बच्चे आपस में मिलकर एक बर्ड-फीडिंग टीम भी बना सकते हैं। इससे उनमें प्रकृति से जुड़ाव और जिम्मेदारी की भावना आएगी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी और कम होते जलस्रोतों की वजह से पक्षियों की संख्या घट रही है। उनकी प्रजनन दर यानी बच्चे पैदा करने की क्षमता भी कम हो गई है। गौरैया जैसे पक्षी अब शहरों में घोंसले नहीं बना पा रहे क्योंकि उन्हें न तो जगह मिलती है, न भोजन और न पानी।

अगर एक बच्चा भी एक प्याला पानी रखे, और फिर उसके दोस्त, परिवार वाले और पड़ोसी भी ऐसा करें — तो यह एक बड़ा बदलाव ला सकता है। सोचिए अगर हर गली, हर स्कूल, हर कॉलोनी में परिंदों के लिए पानी हो — तो कितनी ज़िंदगियाँ बच सकती हैं। यह एक अभियान बन सकता है — "हर घर एक प्याला पानी"।

गर्मी हर साल आती है, और हर साल कुछ पक्षी प्यास से तड़प जाते हैं। लेकिन इस बार, हम कुछ अलग और अच्छा कर सकते हैं। हम एक प्याला पानी रखकर किसी परिंदे की जान बचा सकते हैं।

तो आइए, आज से ही यह काम शुरू करें। अपने घर में एक बर्तन रखें। रोज़ उसमें ताज़ा पानी भरें। थोड़ा दाना भी डालें। और सबसे ज़रूरी — दूसरों को भी प्रेरित करें।

पक्षियों की चहचहाहट फिर से लौटेगी — बस ज़रूरत है हमारी एक कोशिश की|

                                                               पक्षियों की प्यास

      गर्मी आई, सूरज तेज़,

      पक्षी बेचारे हो गए फेल।

      ना तालाब, ना पानी की धार,

      प्यासे उड़ते बार-बार।

                                                           गौरैया जो चहकती थी,

                                                           अब वो भी कम दिखती है।

                                                            मैना, कबूतर, बुलबुल प्यारे,

                                                            ढूंढें पानी सारे दिन हमारे।

      प्यास से जब गला सूखता है,

     पंख भी उड़ने से रुकता है।

     पर अगर हम थोड़ा ध्यान दें,

     तो इनका जीवन आसान बनें।

                                                   रखें एक प्याला साफ़ जल,

                                                  बालकनी या छत पर हर पल।

                                                   साथ में थोड़ा दाना भी हो,

                                                   परिंदों को खाना भी तो दो!


      मिट्टी या स्टील का हो बर्तन,

      हर दिन बदलें उसमें जल।

      पेड़ के नीचे, कोने में रखें,

      जहाँ परिंदे आराम से बैठें।


                                                  छोटी सी यह मदद हमारी,

                                                  बन जाए इनके लिए प्यारी।

                                                  हम सबका है ये संसार,

                                                  पक्षी भी हैं इसका अंग समान।

      तो आओ मिलकर काम करें,

      हर घर में एक प्याला धरें।

      गर्मी में न कोई प्यासा हो,

      हर पंख खुशहाल और हँसा हो।



Sunday, April 6, 2025

क्या स्कूल सिर्फ अमीरों के लिए हैं? रिया की कहानी और सरकारी स्कूल की सच्चाई जानिए आसान भाषा में!

 



रिया की मौत से उठे सवाल: क्या शिक्षा अब व्यापार बन गई है? पढ़ें एक दर्दनाक सच्चाई जो हर दिल को झकझोर देगी।


• रिया की मौत एक सवाल है हम सबके लिए—क्या हमारे देश में गरीब बच्चों को शिक्षा का हक नहीं? पढ़ें दिल छू लेने वाली कहानी।

• क्या शिक्षा अब अमीरों की जागीर बन गई है? रिया की दर्दनाक कहानी आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।

• एक मासूम की जान गई सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके पास फीस नहीं थी—क्या यही है हमारा शिक्षा तंत्र?

• रिया चली गई, पर छोड़ गई सवाल—क्या गरीब होना अब गुनाह है? पढ़ें एक सच्ची और झकझोर देने वाली कहानी।



रिया अब कभी स्कूल नहीं जाएगी...

ये कहानी एक बच्ची की है। बिल्कुल हमारी और आपकी तरह। उसका नाम था रिया प्रजापति। वो उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की रहने वाली थी और 9वीं कक्षा में पढ़ती थी।

रिया पढ़ने में अच्छी थी, सपने देखती थी कि बड़ी होकर कुछ बन पाएगी। लेकिन उसके स्कूल ने उससे एक गलती कर दी… नहीं, गलती नहीं… बहुत बड़ा जुल्म।

उसकी स्कूल की फीस थोड़ी बाकी रह गई थी। इसलिए स्कूल वालों ने उसे परीक्षा देने से रोक दिया और सबके सामने अपमानित किया।

रिया बहुत दुखी हुई। इतना दुखी कि उसने अपनी जान ही दे दी…

अब सोचिए, क्या सिर्फ पैसे न होने की वजह से किसी बच्चे को पढ़ने से रोका जाना चाहिए?

हम सब स्कूल जाते हैं, पढ़ते हैं, सपने देखते हैं। लेकिन अगर किसी के पास पैसे न हों तो क्या वो स्कूल नहीं जा सकता?

हम कहते हैं कि "शिक्षा सबका हक है," लेकिन क्या वाकई ऐसा है?


क्या यही है हमारी नई शिक्षा नीति?

आज हम चाँद तक पहुंच गए हैं, मोबाइल और कंप्यूटर सब कुछ डिजिटल हो गया है। लेकिन गरीब बच्चों के लिए स्कूल जाना अब भी बहुत मुश्किल है।

कई प्राइवेट स्कूल शिक्षा को "बिज़नेस" बना चुके हैं।

• फीस बहुत ज्यादा होती है

• बिल्डिंग चार्ज, यूनिफॉर्म, किताबों के नाम पर पैसे लिए जाते हैं

• और अगर कोई बच्चा पैसे न दे पाए, तो उसे सबके सामने शर्मिंदा किया जाता है।

क्या ये सही है?

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रिया चली गई… लेकिन सवाल छोड़ गई

रिया अब हमारे बीच नहीं है। लेकिन उसकी कहानी हम सबको एक बात सिखाती है—हर बच्चे को पढ़ने का हक है, चाहे वो अमीर हो या गरीब।

कई बच्चे अभी भी चुप हैं, डर के मारे कुछ कह नहीं पाते। लेकिन हमें आवाज़ उठानी चाहिए।

क्योंकि अगली रिया कोई और नहीं… हमारे घर की भी हो सकती है।

हम क्या कर सकते हैं?

• अपने स्कूल में अगर कोई बच्चा परेशान हो रहा है, तो उसकी मदद करें।

• फीस या ड्रेस की वजह से अगर कोई बच्चा रो रहा हो, तो टीचर्स या पैरेंट्स से बात करें।

• और सबसे जरूरी—कभी किसी का मज़ाक न उड़ाएं, बल्कि साथ दें

हम मिलकर रिया जैसी कई ज़िंदगियों को बचा सकते हैं।

रिया की दर्दनाक कहानी बताती है कि हर बच्चे को शिक्षा का हक चाहिए, न कि अपमान। आइए, बदलाव की शुरुआत करें।





क्या वाकई प्राइवेट स्कूल ही हैं बेहतर? जानिए सरकारी स्कूल की असली ताकत और बचत का गणित !

आज के समय में हर माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि अच्छी शिक्षा सिर्फ प्राइवेट स्कूलों में ही मिले। आइए एक नज़र डालें कि प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश लेने से पहले आपको किन खर्चों पर ध्यान देना चाहिए:

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प्राइवेट स्कूल की औसत वार्षिक लागत:

खर्च का प्रकार अनुमानित राशि

स्कूल फीस (प्रति वर्ष) ₹12,000 - ₹36,000

बस किराया ₹12,000

परीक्षा शुल्क ₹1,000

यूनिफॉर्म, टाई, बेल्ट आदि ₹1,000

किताबें ₹2,000

स्टेशनरी ₹3,000

टिफिन (₹20 प्रति दिन) ₹6,000

अन्य खर्चे ₹4,000

कुल वार्षिक खर्च ₹41,000

👉 14 साल में कुल खर्च: ₹5,74,000

👉 अगर 2 बच्चे हैं: ₹11,48,000 और नौकरी की कोई गारंटी नहीं!

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👉 अब जानिए सरकारी विद्यालयों की सुविधाएं:

✅ कोई शुल्क नहीं

✅ दो जोड़ी यूनिफॉर्म फ्री

✅ किताबें फ्री (अब NCERT)

✅ मिड-डे मील, दूध और फल फ्री

✅ जूते-मोजे, बैग, स्वेटर फ्री

✅ स्मार्ट क्लासेस और प्रोजेक्टर से पढ़ाई

✅ योग्य शिक्षक—B.Ed., TET, Super-TET पास

✅ खेलकूद, लाइब्रेरी, मासिक एसएमसी बैठक

✅ अभिभावकों के साथ सीधा संवाद और निगरानी

✅ नई शिक्षा नीति आधारित, बाल केंद्रित पाठ्यक्रम

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👉 तुलना: प्राइवेट vs सरकारी स्कूल

सुविधा प्राइवेट स्कूल सरकारी स्कूल

फीस ₹41,000+/वर्ष ₹0

किताबें खुद खरीदनी पड़ती हैं फ्री।

मिड-डे मील नहीं हां

ड्रेस, जूते, बैग अलग से खर्च फ्री

शिक्षक कभी प्रशिक्षित नहीं B.Ed./TET पास

डिजिटल क्लास कभी-कभी अब हर स्कूल में


👉 सोचिए, समझिए, फिर फैसला लीजिए।

“अगर आप चाहें, तो प्राइवेट स्कूल की फीस बचाकर हर साल FD कर सकते हैं—14 साल में यह रकम ₹20 लाख से ज़्यादा हो जाएगी!”

👉 अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजें। न सिर्फ शिक्षा मुफ्त है, बल्कि गुणवत्ता और सुविधा दोनों भी शानदार हैं।


👉 अगर आप सहमत हैं, तो इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाएँ।

आप और आपके माता-पिता भी तो सरकारी स्कूल से पढ़कर ही निकले थे... और आज सफल हैं।

प्राइवेट स्कूलों की भारी फीस vs सरकारी स्कूलों की फ्री सुविधाएं—अब सोच-समझकर लें बच्चों की पढ़ाई का फैसला।


यह संदेश हर अभिभावक के लिए है—समझदारी से शिक्षा चुनिए।


शिक्षा की सच्चाई: प्राइवेट स्कूल बनाम सरकारी स्कूल—खर्च, सुविधाएं और अभिभावकों की पसंद……

निजी स्कूलों की लागत

मैं लखनऊ में निजी स्कूलों की अनुमानित वार्षिक लागत की जानकारी जुटा रहा हूँ। इसमें स्कूल फीस, बस किराया, परीक्षा शुल्क, यूनिफॉर्म, किताबें और स्टेशनरी जैसे विभिन्न खर्चों को शामिल किया जाएगा। मेरा लक्ष्य यह समझना है कि अभिभावकों के लिए निजी शिक्षा का वित्तीय बोझ कितना हो सकता है।

सरकारी स्कूलों में मुफ्त सुविधाएँ

उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में मुफ्त मिलने वाली सुविधाओं की पुष्टि करने की प्रक्रिया में हूँ। इनमें दो जोड़ी यूनिफॉर्म, किताबें (एनसीईआरटी), मध्याह्न भोजन, दूध, फल, जूते-मोजे, बैग और स्वेटर शामिल हैं। मैं यह भी जानने की कोशिश कर रहा हूँ कि ये सुविधाएँ कितनी अच्छी गुणवत्ता की हैं और क्या ये सभी सरकारी स्कूलों में उपलब्ध हैं।

स्मार्ट कक्षाएँ और शिक्षक योग्यता

मैं उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में स्मार्ट कक्षाओं और प्रोजेक्टरों की उपलब्धता और उपयोग के बारे में जानकारी एकत्र कर रहा हूँ। साथ ही, मैं सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की योग्यता (बी.एड., टीईटी, सुपर-टीईटी) और उनके प्रशिक्षण के बारे में भी पता लगा रहा हूँ ताकि निजी स्कूलों के शिक्षकों से उनकी तुलना की जा सके।

अन्य सुविधाएँ और नई शिक्षा नीति

सरकारी स्कूलों में खेलकूद की सुविधाओं, पुस्तकालयों और स्कूल प्रबंधन समितियों (एसएमसी) की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हूँ। इसके अतिरिक्त, मैं यह भी देखना चाहता हूँ कि उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत बाल-केंद्रित पाठ्यक्रम को किस हद तक लागू किया गया है।

निजी स्कूलों को प्राथमिकता

मेरा अगला कदम यह पता लगाना है कि लखनऊ में अभिभावक सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा और सुविधाओं के बावजूद अपने बच्चों को निजी स्कूलों में क्यों भेजना पसंद करते हैं। इसके पीछे संभावित कारण, जैसे शिक्षा की कथित गुणवत्ता, बुनियादी ढाँचा और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, की जाँच करना चाहता हूँ।







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