







TSCT एक ऐसा संगठन है जो शिक्षकों की मदद के लिए बनाया गया है। जब कोई शिक्षक साथी किसी परेशानी में होता है, जैसे कि बीमारी, दुर्घटना या अचानक निधन हो जाता है, तब TSCT उसकी और उसके परिवार की सहायता करता है। TSCT का पूरा नाम Teachers Social Contribution Team होता है। इस संगठन का काम है कि जब भी किसी शिक्षक को मदद की जरूरत हो, तो तुरंत सहायता दी जाए। अगर कोई शिक्षक साथी दुनिया से चला जाता है, तो उसके परिवार को आर्थिक मदद दी जाती है ताकि वे अपनी जरूरतों को पूरा कर सकें।
TSCT में कई शिक्षक भाई-बहन जुड़े हुए हैं। सभी साथी समय-समय पर अपनी तरफ से छोटा-छोटा सहयोग करते हैं। इस तरह जब भी कोई मुसीबत आती है, तो संगठन के पास पहले से पैसा जमा होता है और तुरंत मदद दी जा सकती है। TSCT का नियम है कि मदद देने में कोई देरी नहीं होनी चाहिए, ताकि परेशान परिवार को जल्दी सहारा मिल सके। संगठन के सभी काम पारदर्शी तरीके से होते हैं यानी जो भी सहयोग आता है या दिया जाता है, उसकी पूरी जानकारी सभी सदस्यों को दी जाती है।
TSCT में कोई भी शिक्षक भाई-बहन शामिल हो सकता है। इसमें कोई जबरदस्ती नहीं होती। जो अपनी इच्छा से समाज सेवा करना चाहते हैं, वही इसमें जुड़ते हैं। संगठन के पास एक मोबाइल ऐप भी है, जिससे मदद भेजना और जानकारी लेना आसान हो जाता है। आज के समय में जब सब कुछ मोबाइल से हो रहा है, TSCT ने भी अपनी सेवा को तेज और आसान बना दिया है।
यह संगठन इसलिए भी खास है क्योंकि यहां किसी सरकारी मदद का इंतजार नहीं करना पड़ता। जब कोई संकट आता है, तो TSCT तुरंत मदद कर देता है। शिक्षक समाज को मजबूत बनाने के लिए यह संगठन बहुत जरूरी है। जब शिक्षकों को सुरक्षा और सहारा मिलेगा, तभी वे भी बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकेंगे और समाज को आगे बढ़ा सकेंगे।
TSCT में शामिल होने से हर सदस्य को यह भरोसा होता है कि अगर भविष्य में उसे भी कोई परेशानी आई, तो संगठन उसके साथ खड़ा रहेगा। संगठन सभी सदस्यों का सम्मान भी करता है और समय-समय पर सामाजिक कार्यक्रम जैसे रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य जांच, सम्मान समारोह आदि भी कराता है।
अब तक TSCT ने कई ऐसे परिवारों की मदद की है जिनके घर के सदस्य शिक्षक साथी अचानक बीमार हुए या दुनिया से चले गए। कई बार ऐसे दुखद समय में सरकारी मदद आने में देर लगती है, लेकिन TSCT बिना देरी के मदद करता है। बहुत से शिक्षक साथी कहते हैं कि TSCT ने मुश्किल समय में उन्हें एक परिवार की तरह सहारा दिया। सभी शिक्षक मिलकर जब थोड़ा-थोड़ा सहयोग करते हैं, तो बड़ी मदद बन जाती है। यही TSCT की असली ताकत है।
भविष्य में TSCT और भी बड़े स्तर पर काम करना चाहता है। संगठन की योजना है कि जरूरतमंद शिक्षकों के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति दी जाए, आवासीय सहायता मिले, पेंशन न पाने वाले शिक्षकों को मदद दी जाए और सभी के लिए स्वास्थ्य बीमा भी कराया जाए। TSCT यह भी चाहता है कि शिक्षकों के लिए एक ऐसा माहौल बने जिसमें वे खुद को सुरक्षित महसूस करें और बिना किसी डर के अपना जीवन आगे बढ़ा सकें।
TSCT मानता है कि शिक्षक केवल पढ़ाने का काम ही नहीं करते, बल्कि समाज के निर्माण में भी बड़ा योगदान देते हैं। इसलिए TSCT ने कई सामाजिक काम भी किए हैं जैसे गरीब बच्चों को किताबें देना, पेड़ लगाना और लड़कियों की पढ़ाई को बढ़ावा देना। ऐसे काम करके TSCT यह बताता है कि शिक्षक समाज के हर क्षेत्र में बदलाव ला सकते हैं।
आज TSCT उन सभी शिक्षकों के लिए एक उम्मीद बन चुका है जो किसी संकट में पड़ जाते हैं। यह संगठन न केवल आर्थिक सहायता करता है, बल्कि भावनात्मक रूप से भी लोगों का सहारा बनता है। जब कोई शिक्षक दुखी होता है, तो TSCT उसे यह भरोसा दिलाता है कि वह अकेला नहीं है। संगठन का हर सदस्य एक दूसरे के साथ खड़ा रहता है।
अगर हम चाहते हैं कि शिक्षक समाज मजबूत हो, तो हमें भी ऐसे संगठनों को सहयोग देना चाहिए। जो सहयोग हम आज करेंगे, वही कल हमारे लिए एक मजबूत सुरक्षा बन सकता है। इसीलिए हमें समय रहते TSCT से जुड़ना चाहिए और इसमें अपना योगदान देना चाहिए। संगठन की ताकत सभी सदस्यों के सहयोग से बढ़ती है। जब सभी मिलकर साथ चलते हैं, तो कोई भी मुश्किल हमें हरा नहीं सकती। आज का छोटा सा योगदान कल किसी के जीवन में बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।
आइए, हम सब मिलकर TSCT को और मजबूत बनाएं। एक दूसरे की मदद करें और शिक्षक समाज को गर्व के साथ आगे बढ़ाएं। जब हम मिलकर काम करेंगे, तभी हमारा समाज और देश भी मजबूत बनेगा। TSCT हमारे लिए एक परिवार की तरह है, जिसमें हर सदस्य का सुख-दुख बांटा जाता है। इस परिवार को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी हम सबकी है।
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22 अप्रैल 2025 का दिन देश के लिए बहुत दुख और सदमे से भरा हुआ रहा। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम इलाके में बायसरन नाम की एक सुंदर और हरी-भरी जगह है, जिसे लोग 'मिनी स्विट्जरलैंड' भी कहते हैं। यह जगह घने जंगलों, बर्फ से ढके पहाड़ों और खूबसूरत मैदानों के कारण बहुत प्रसिद्ध है। गर्मियों की छुट्टियों में लोग परिवार के साथ घूमने-फिरने आते हैं और यहां की ठंडी हवा, हरियाली और शांत वातावरण का आनंद लेते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार बायसरन में कुछ ऐसा हुआ जिसने देशभर के लोगों का दिल दहला दिया।
मंगलवार की दोपहर को करीब तीन बजे का समय था। बायसरन पार्क में बहुत सारे लोग अपने परिवार के साथ टट्टू की सवारी कर रहे थे, बच्चे घास पर खेल रहे थे, कुछ लोग फोटोग्राफी कर रहे थे और कुछ खाने-पीने की दुकानों के पास चाय और स्नैक्स का आनंद ले रहे थे। तभी अचानक वहां कुछ लोग सेना की वर्दी पहनकर आए। उन्हें देखकर किसी को शक नहीं हुआ, क्योंकि ऐसा लग रहा था कि वो सेना के जवान हैं और पर्यटकों की सुरक्षा के लिए आए हैं। लेकिन कुछ ही देर बाद सब कुछ बदल गया।
सेना की वर्दी में आए ये लोग असली सैनिक नहीं थे। ये आतंकवादी थे, जो पहले से योजना बनाकर आए थे। उन्होंने सबसे पहले लोगों को इकट्ठा किया और फिर उनसे उनका नाम और धर्म पूछा। कुछ लोगों से पहचान पत्र भी दिखवाए। जब उन्हें यह पता चला कि सामने खड़ा व्यक्ति हिंदू है और उसने कलमा नहीं पढ़ा है, तो उन्होंने उस पर गोलियां चला दीं। यह बहुत ही क्रूर और अमानवीय हमला था। लोग भागने लगे, बच्चों की चीखें गूंजने लगीं, और चारों ओर अफरा-तफरी मच गई।
इस हमले में कुल 26 लोगों की मौत हो गई और 17 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। मरने वालों में ज्यादातर लोग अलग-अलग राज्यों से आए पर्यटक थे। कोई अपने माता-पिता के साथ आया था, कोई अपने बच्चों के साथ और कोई अपने जीवनसाथी के साथ। लेकिन अब वे सब वापस नहीं जा पाए। उनकी यात्रा वहीं खत्म हो गई। यह हमला पुलवामा के बाद जम्मू-कश्मीर में सबसे बड़ा आतंकवादी हमला माना जा रहा है।
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि हमलावर चार से छह की संख्या में थे। वे देवदार के पेड़ों के पीछे से चुपचाप आए थे और अचानक हमला कर दिया। उनके पास ऑटोमैटिक राइफलें थीं। उन्होंने पहले हिन्दू पहचान करने के लिए कई लोगों से बातें कीं और जैसे ही उनकी पहचान सुनिश्चित हुई, उन पर गोलियों की बौछार कर दी। जो लोग वहां मौजूद थे, उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा भयानक मंजर कभी नहीं देखा।
घटना के बाद सुरक्षा बलों को खबर दी गई और तुरंत सेना, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवान वहां पहुंचे। उन्होंने इलाके को घेर लिया और आतंकियों की तलाश शुरू की। घायलों को हेलीकॉप्टर से श्रीनगर के अस्पतालों में भेजा गया, जहां उनका इलाज चल रहा है। बहुत सारे लोग अब भी सदमे में हैं और बोल पाने की स्थिति में नहीं हैं।
इस हमले की जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकवादी संगठन 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' (TRF) ने ली है। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि इस हमले का मास्टरमाइंड लश्कर का डिप्टी चीफ सैफुल्लाह खालिद है। सैफुल्लाह खालिद पाकिस्तान में बैठकर आतंक फैलाने की योजना बनाता है और पाकिस्तानी सेना की मदद से उन्हें अंजाम देता है। उसे हाल ही में पाकिस्तान के एक शहर में भाषण देने के लिए बुलाया गया था, जहां उसने भारतीय लोगों के खिलाफ नफरत फैलाई।
हमले में जिन लोगों की जान गई, उनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, गुजरात, हरियाणा, केरल, ओडिशा, मध्यप्रदेश और यहां तक कि नेपाल और अरुणाचल प्रदेश से भी लोग थे। वे सभी सिर्फ छुट्टी मनाने और कश्मीर की खूबसूरती देखने आए थे। लेकिन अब उनकी लाशें घर पहुंचीं, जिससे उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
इस हमले ने न केवल पूरे देश को दुखी किया है, बल्कि एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है कि क्या पर्यटक अब सुरक्षित हैं? क्या परिवारों के साथ घूमने जाने वाले लोग अब डर के साए में जिएंगे? क्या धर्म के नाम पर किसी की जान लेना सही है? इन सवालों के जवाब ढूंढना सरकार, सुरक्षा एजेंसियों और हम सभी की जिम्मेदारी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय विदेश दौरे पर थे और अमेरिका के उपराष्ट्रपति भारत दौरे पर आए थे। इस हमले का समय भी सोच-समझकर चुना गया था, ताकि दुनिया का ध्यान इस ओर जाए कि जम्मू-कश्मीर अब भी सुरक्षित नहीं है। इस हमले से यह संदेश देने की कोशिश की गई कि जम्मू-कश्मीर में पर्यटक सुरक्षित नहीं हैं, खासकर हिंदू धर्म के लोग।
यह हमला अमरनाथ यात्रा से कुछ समय पहले हुआ, लेकिन यह यात्रा से जुड़ा नहीं था। यह उन लोगों पर हमला था, जो सिर्फ घूमने और प्रकृति का आनंद लेने आए थे। वे न तो किसी धार्मिक कार्य में लगे थे, न ही किसी राजनीतिक मकसद से आए थे। वे आम नागरिक थे, जो छुट्टी मना रहे थे।
हमले के बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस ने तीन संदिग्ध आतंकियों के स्केच जारी किए हैं, जिनके नाम आसिफ फौजी, सुलेमान शाह और अबु तल्हा बताए गए हैं। सुरक्षा एजेंसियां अब इनकी तलाश में जंगलों और आसपास के इलाकों में छानबीन कर रही हैं। साथ ही, बायसरन और आसपास के इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
इस हमले के बाद देशभर में गुस्सा और दुख की लहर फैल गई है। सोशल मीडिया पर लोगों ने सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। कई राज्यों में मृतकों को श्रद्धांजलि देने के लिए शोक सभाएं आयोजित की गईं। स्कूलों और कार्यालयों में दो मिनट का मौन रखा गया और मोमबत्तियां जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।
पर्यटन मंत्रालय ने भी इस हमले की निंदा की और कहा कि ऐसी घटनाएं देश की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं। साथ ही, सरकार ने सभी राज्यों के पर्यटकों से अपील की है कि वे सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत पुलिस को दें।
अब यह सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि इस हमले के दोषियों को पकड़कर उन्हें कड़ी सजा दिलवाएं। साथ ही, पर्यटकों की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में कोई भी परिवार इस तरह के दुख का सामना न करे।
यह हमला हमें यह भी याद दिलाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। जो लोग धर्म के नाम पर खून बहाते हैं, वे इंसान नहीं हो सकते। एक सच्चा इंसान किसी की मुस्कान, किसी के परिवार और किसी के सपने छीनने का हकदार नहीं हो सकता। हमें एकजुट होकर नफरत के इन सौदागरों का विरोध करना होगा और देश में शांति, भाईचारे और प्रेम की भावना को बनाए रखना होगा।
देश आज भी उन 26 निर्दोष लोगों के लिए शोक मना रहा है, जो केवल पहलगाम की सुंदरता देखने आए थे, लेकिन उनकी जिंदगी वहीं खत्म हो गई। उनका कसूर बस इतना था कि वे किसी एक धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने किसी का 'कलमा' नहीं पढ़ा। यह एक बहुत ही शर्मनाक और अमानवीय सोच है, जिसे हमें मिलकर खत्म करना होगा।
हमले के बाद बचे लोगों ने जो बताया, वह बहुत ही दर्दनाक था। एक महिला ने बताया कि उसका बेटा घास पर खेल रहा था, और तभी गोली चलने लगी। उसने अपने बेटे को बचाने की कोशिश की, लेकिन गोली उसके पति को लग गई और वह वहीं गिर पड़ा। एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि वह अपने माता-पिता के साथ आया था, और सब लोग बहुत खुश थे। लेकिन अचानक गोलियां चलने लगीं और उसका भाई वहीं मारा गया। ऐसे कितने ही लोगों की कहानियां हैं, जो सुनकर आंखों से आंसू निकल आते हैं।
हम सबको इस घटना से सीख लेनी चाहिए और अपने देश, अपने लोगों और अपने समाज की सुरक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए। कोई भी ताकत हमें डराकर नहीं हरा सकती, जब तक हम मिलकर उसका विरोध करते रहें। इन शहीद पर्यटकों की याद में हमें अपने देश को और मजबूत और सुरक्षित बनाना होगा।
शिक्षक कभी रिटायर नहीं होता — सम्मान समारोह में जीवन भर की उपलब्धियों को सलाम
दिनांक 19 अप्रैल 2025 को उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ, अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ, ब्लॉक इकाई मैंथा कानपुर देहात द्वारा एक बहुत ही सुंदर और भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम विकासखंड मैथा के उन शिक्षकों के सम्मान में किया गया, जिन्होंने लंबे समय तक शिक्षा सेवा दी और 31 मार्च 2025 को सेवानिवृत्त हुए। यह समारोह टाउन एरिया गेस्ट हाउस शिवली, कानपुर देहात में बड़े ही अच्छे तरीके से और खुशी-खुशी मनाया गया। इस कार्यक्रम में सेवानिवृत्त होने वाले शिक्षकों का सम्मान किया गया।
सेवानिवृत्त शिक्षकों में श्री अशोक कुमार शुक्ला जो कि जिला मंत्री, उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ और प्रधानाध्यापक, उच्च प्राथमिक विद्यालय औगी मैंथा के पद पर कार्यरत थे, श्रीमती रमा वर्मा, प्रधानाध्यापक, उच्च प्राथमिक विद्यालय कारानी, श्रीमती उषा कटियार, प्रधानाध्यापक, उच्च प्राथमिक विद्यालय औरंगाबाद, श्री ओम नारायण कटियार, प्रधानाध्यापक, प्राथमिक विद्यालय रंजीतपुर और श्रीमती रुखसाना बेगम, सहायक अध्यापक, उच्च प्राथमिक विद्यालय जुगराजपुर शिवली शामिल रहे। सभी शिक्षकों को इस समारोह में बड़े सम्मान के साथ बुलाया गया और उनके कार्यकाल की प्रशंसा की गई।
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती के पूजन, अर्चन और माल्यार्पण से की गई। सबसे पहले मुख्य अतिथि श्री राजेंद्र सिंह, जिन्हें सभी राजू भैया के नाम से जानते हैं और जो कंचौसी टाउन एरिया के प्रथम अध्यक्ष और जिला पंचायत अध्यक्ष के पति हैं, ने दीप जलाकर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता नगर पंचायत शिवली के अध्यक्ष श्री अवधेश शुक्ला ने की।
कार्यक्रम में नगर पंचायत सिकंदरा की अध्यक्षा श्रीमती सीमा पाल और उनके प्रतिनिधि श्री पंकज पाल भी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इनके साथ ही खंड शिक्षा अधिकारी मैथा सुश्री सपना सिंह भी समारोह में पधारीं। सबसे पहले सभी अतिथियों का स्वागत उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के जनपद और ब्लॉक पदाधिकारियों द्वारा माल्यार्पण और फूलों से किया गया।
इसके बाद मुख्य अतिथि श्री राजेंद्र सिंह राजू भैया ने सभी सेवानिवृत्त शिक्षकों को मंच पर बुलाया और माल्यार्पण कर, प्रतीक चिन्ह भेंट कर और अंग वस्त्र पहनाकर सम्मानित किया। इसके साथ ही विशिष्ट अतिथियों ने भी सेवानिवृत्त शिक्षकों का सम्मान किया। पूरे माहौल में खुशियों और सम्मान की भावना दिख रही थी।
मुख्य अतिथि श्री राजेंद्र सिंह ने अपने भाषण में कहा कि शिक्षक कभी भी पूरी तरह से सेवानिवृत्त नहीं होता। वह केवल एक पड़ाव पार करता है, लेकिन समाज और शिक्षा के लिए उसका मार्गदर्शन जीवनभर बना रहता है। उन्होंने सभी सेवानिवृत्त शिक्षकों को शुभकामनाएं दीं और कहा कि आप सभी का जीवन हमेशा खुशहाल और सुखद हो।
इसके बाद विशिष्ट अतिथि श्रीमती सीमा पाल ने कहा कि एक शिक्षक समाज का सबसे बड़ा निर्माता होता है। वह बच्चों को पढ़ाकर उनके भविष्य को संवारता है। उन्होंने सेवानिवृत्त शिक्षकों को शुभकामनाएं दीं और उनके जीवन में सुख-शांति की कामना की। खंड शिक्षा अधिकारी सुश्री सपना सिंह ने भी अपने शब्दों में कहा कि यह बहुत अच्छा और सुंदर कार्यक्रम है। शिक्षक संघ की ब्लॉक इकाई ने इसे बहुत ही अच्छे तरीके से आयोजित किया है। उन्होंने सभी सेवानिवृत्त शिक्षकों को बधाई दी और कहा कि आपका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।
नगर पंचायत शिवली के अध्यक्ष श्री अवधेश शुक्ला ने अपने भाषण में रामायण की कहानियों का उदाहरण देकर बताया कि जीवन में सेवा और सम्मान का बहुत महत्व है। उन्होंने कहा कि शिक्षक वही है जो जीवनभर शिक्षा देता है। उन्होंने सभी शिक्षकों की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना की। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के कार्यक्रम से सभी को प्रेरणा मिलती है।
इस समारोह में शिक्षकों के साथ-साथ अनुदेशक, शिक्षामित्र, बेसिक शिक्षा विभाग के सभी कर्मचारी और बहुत सारे स्थानीय लोग भी मौजूद रहे। सभी ने पूरे कार्यक्रम का आनंद लिया और सेवानिवृत्त शिक्षकों का सम्मान करते हुए तालियां बजाईं।
कार्यक्रम के अंत में उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष श्री एल.बी. सिंह, ब्लॉक अध्यक्ष श्री मुकेश बाजपेई और ब्लॉक मंत्री श्री शशिकांत यादव ने सभी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि हम सबका कर्तव्य है कि अपने शिक्षकों का सम्मान करें और उनके अनुभवों से सीखें। उन्होंने कहा कि संगठन का हमेशा यह प्रयास रहेगा कि शिक्षकों का मान-सम्मान इसी तरह बना रहे।
उन्होंने उपस्थित सभी अतिथियों, शिक्षकों, अनुदेशकों, शिक्षामित्रों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि इतने अच्छे और व्यवस्थित कार्यक्रम के लिए सभी को बधाई और शुभकामनाएं।
इस समारोह में शिक्षकों ने भी अपने-अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि किस तरह उन्होंने अपने जीवन के कई साल बच्चों को पढ़ाने और संस्कार देने में लगाए। कई शिक्षक अपनी बातें कहते हुए भावुक हो गए। उन्होंने कहा कि शिक्षक कभी रिटायर नहीं होता। वह हमेशा समाज और अपने आसपास के लोगों को कुछ न कुछ सिखाता रहता है।
सभी ने मिलकर यह ठाना कि आगे भी इस तरह के कार्यक्रम होते रहने चाहिए ताकि शिक्षक समाज का सम्मान और गौरव हमेशा बना रहे। इस पूरे कार्यक्रम में कहीं भी अव्यवस्था नहीं थी। सब कुछ बहुत अच्छे ढंग से हुआ।
यह कार्यक्रम शिक्षा जगत के लिए प्रेरणा देने वाला और समाज में शिक्षकों के सम्मान को दर्शाने वाला रहा। इस कार्यक्रम ने यह भी बताया कि समाज में शिक्षक का कितना बड़ा स्थान है। अगर शिक्षक न हों तो समाज का निर्माण ही अधूरा रह जाता है।
कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और सरस्वती वंदना ने भी सबका मन मोह लिया। पूरे समय वातावरण में खुशी और सम्मान का माहौल रहा। हर किसी के चेहरे पर मुस्कान और गर्व साफ दिख रहा था।
अंत में एक बार फिर से उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ की ओर से सभी का आभार व्यक्त किया गया और यह संकल्प लिया गया कि आगे भी ऐसे आयोजन होते रहेंगे।
इस पूरे कार्यक्रम की सफलता ने यह साबित कर दिया कि शिक्षक हमारे समाज की सबसे मजबूत और सम्मानित कड़ी हैं। जो हर समय देश, समाज और बच्चों के भविष्य को संवारने में लगे रहते हैं।
यह दिन सभी के लिए यादगार और प्रेरणा देने वाला रहा। सभी ने मिलकर इसे एक यादगार समारोह बना दिया।
सरकारी कर्मचारियों के हक की लड़ाई! पुरानी पेंशन बहाली के लिए 1 मई 2025 को जंतर-मंतर, दिल्ली चलें। एकजुटता दिखाएं, भविष्य सुरक्षित बनाएं।
पेंशन एक ऐसी चीज़ है, जो हर सरकारी कर्मचारी के जीवन में बहुत ज़रूरी होती है। जब कोई इंसान अपने पूरे जीवन का सबसे अच्छा समय नौकरी में लगा देता है, दिन-रात मेहनत करता है, अपने परिवार से दूर रहकर, कई बार खतरों का सामना करके देश और समाज के लिए काम करता है, तो उसके बुढ़ापे का सहारा वही पेंशन होती है। पेंशन एक ऐसी लाठी है, जो बुढ़ापे में इंसान को सहारा देती है। जब शरीर जवाब देने लगता है, काम करने की ताकत नहीं रहती, तब यही पेंशन हर महीने एक उम्मीद लेकर आती है कि अब भी हमारा जीवन सम्मान से चल सकेगा।
आज देशभर में बहुत से कर्मचारी इस पेंशन के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। नई पेंशन योजना के आने के बाद से पुरानी पेंशन योजना बंद कर दी गई, और कर्मचारियों को एक ऐसे सिस्टम में डाल दिया गया, जिसमें बुढ़ापे में उन्हें ये भरोसा नहीं रहता कि उनका जीवन बिना किसी चिंता के चलेगा। अब कर्मचारियों को यह डर सताने लगा है कि जब हम बूढ़े हो जाएंगे, तब कौन हमारी मदद करेगा? हमारी पेंशन तो अब तय ही नहीं है, बाजार के उतार-चढ़ाव पर चलने वाली रकम पर हम कैसे अपना भविष्य सुरक्षित मानें? इसी बात ने हजारों कर्मचारियों को एकजुट किया है, और वे अब पुरानी पेंशन बहाली के लिए आंदोलन कर रहे हैं।
कई राज्यों में इस मुद्दे पर धरने-प्रदर्शन हो चुके हैं। हिमाचल प्रदेश ने इस लड़ाई को बखूबी लड़ा और वहां की सरकार को पुरानी पेंशन योजना लागू करनी पड़ी। यह सब हुआ कर्मचारियों की एकजुटता और हिम्मत के कारण। उन्होंने अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर सड़कों पर आंदोलन किया, अपनी आवाज़ को बुलंद किया और आखिरकार अपना हक पाया। अब वही उम्मीद देश के दूसरे राज्यों के कर्मचारियों को भी है। सबको यह लगने लगा है कि अगर हम भी एकजुट होकर अपनी बात कहें, तो सरकार को हमारी बात माननी पड़ेगी।
इसी सिलसिले में 1 मई 2025 को जंतर-मंतर, दिल्ली में एक बड़ा आंदोलन होने जा रहा है। यह केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक मिशन है। इसमें भाग लेना हर उस कर्मचारी का फर्ज़ है, जो अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा चाहता है। यह लड़ाई केवल आज की नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की भी है। अगर आज हम चुप रहेंगे, तो आने वाले समय में हमारे बच्चे और उनके बाद की पीढ़ी भी इसी समस्या से जूझती रहेगी।
कई लोग सोचते हैं कि मैं नहीं जाऊंगा तो क्या फर्क पड़ेगा। पर असली बात यही है कि जब हर कोई यही सोचेगा, तो कोई भी नहीं जाएगा। अगर आप नहीं जाएंगे, तो दूसरा क्यों जाएगा? जब हर कोई ये सोचने लगेगा कि मेरे पास समय नहीं है, मुझे काम है, पत्नी भी नौकरी करती है, बच्चों को देखना है, तो फिर इस लड़ाई को कौन लड़ेगा? ये सोच सही नहीं है। हम चुनाव ड्यूटी करने जाते हैं, स्कूल भी जाते हैं, ऑफिस का सारा काम भी करते हैं, तो फिर अपने हक के लिए क्यों नहीं? अगर आप दो पेंशन लेना चाहेंगे, तो आंदोलन में भी दो लोग जाने चाहिए, आप और आपकी पत्नी। क्योंकि पेंशन दोनों को चाहिए।
बहाने बहुत हो चुके। कोई कहता है कि मैं अगली बार जाऊंगा। पर अगली बार कभी नहीं आती। जो लड़ाई आज लड़नी है, वो आज ही लड़नी पड़ेगी। कोई भी दूसरा आपके लिए लड़ने नहीं आएगा। जब तक आप खुद अपने हक के लिए खड़े नहीं होंगे, तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा। महिलाओं का भी ये सवाल है कि हम कैसे जाएं? लेकिन वही महिलाएं स्कूल भी जाती हैं, ऑफिस भी जाती हैं, चुनाव ड्यूटी भी करती हैं। तो फिर अपने हक के लिए जाना क्यों मुश्किल है? पेंशन आपको भी चाहिए, तो उसके लिए लड़ाई भी आपको ही लड़नी होगी। अपने बच्चों के भविष्य के लिए हमें एक बार फिर से हिमाचल की मातृशक्ति की तरह आगे आना होगा।
कई बार लोग कहते हैं कि हमारे पास समय नहीं है, या हमें गैरसैण नहीं जाना, जिला मुख्यालय नहीं जाना, देहरादून नहीं जाना। तो कब जाओगे? ये बहाने कब तक चलते रहेंगे? क्या जब सबकुछ खत्म हो जाएगा, तब? तब तो कोई फायदा नहीं। पेंशन वो चीज है, जो हर महीने मिलती है। लड़ाई भी उसी तरह लगातार लड़ी जानी चाहिए। जब तक पेंशन नहीं मिलेगी, तब तक धरने भी लगेंगे, प्रदर्शन भी होंगे। जब तक पेंशन बहाल नहीं होगी, हमें चैन से बैठना नहीं है।
जो साथी इस आंदोलन को लड़ रहे हैं, उन्हें भी वही एक पेंशन मिलेगी। वो भी आपके ही जैसे कर्मचारी हैं। उन्होंने अपने विभागीय संगठनों में जिम्मेदारी ली है और अब ये उनका परम कर्तव्य बनता है कि वे इस मिशन में बढ़-चढ़कर भाग लें। अगर वे आपके भविष्य के लिए सड़क पर खड़े हो सकते हैं, तो क्या आप उनके साथ नहीं खड़े हो सकते? ये केवल उनकी लड़ाई नहीं है, ये हम सबकी लड़ाई है।
इस बार सवाल-जवाब और बहानेबाजी बहुत हो गई। अब एक ही जवाब है — 1 मई 2025 को जंतर-मंतर पर चलना है। पुरानी पेंशन बहाली आंदोलन को मजबूत करना है। हमें अपने हक की इस लड़ाई को और तेज़ करना है। अगर हिमाचल के साथियों ने अपने बच्चों को गोद में लेकर आंदोलन किया और जीत हासिल की, तो हम क्यों नहीं कर सकते? हमें भी आलस छोड़कर, बहानेबाजी छोड़कर, निष्क्रियता और नकारात्मकता से बाहर निकलकर, अपने भविष्य के लिए डटकर खड़ा होना होगा।
यह लड़ाई सिर्फ पैसों की नहीं है, यह सम्मान की भी है। जब कोई रिटायर होता है, तो वह चाहता है कि उसे सम्मान के साथ, बिना किसी चिंता के जीवन जीने का हक़ मिले। अगर आज हम खामोश रहेंगे, तो कल कोई हमारी आवाज़ नहीं सुनेगा। कल कोई हमारा हाल भी पूछने नहीं आएगा। इसी लिए आज उठ खड़े होना जरूरी है।
हिमाचल ने दिखा दिया कि जब कर्मचारी एकजुट हो जाएं, तो कोई भी सरकार उनकी मांगें मानने को मजबूर हो जाती है। हमें भी वही करना है। 1 मई 2025 को हमें दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा होकर इतिहास रचना है। हर कर्मचारी को वहां पहुंचना है। सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने से कुछ नहीं होगा। हमें सड़कों पर उतरना होगा। अपने नेताओं को आगे लाना होगा। जनजागरूकता फैलानी होगी। हर किसी को बताना होगा कि पेंशन हमारा अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।
एकजुटता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। जब हम सब एकजुट होंगे, तो हमारी आवाज़ दूर तक जाएगी। सरकार भी तब सुनेगी, जब उसे लगेगा कि अब कर्मचारी शांत बैठने वाले नहीं हैं। इसलिए समय आ गया है, जब हमें अपना हक खुद लेना है। 1 मई 2025 को दिल्ली चल पड़ना है।
हमारे पास अब ज्यादा समय नहीं है। हमें अपने परिवार, अपने बच्चों और अपने बुढ़ापे की चिंता खुद करनी होगी। ये सोचिए कि अगर पुरानी पेंशन नहीं मिली, तो बुढ़ापे में जब तनख्वाह नहीं मिलेगी और इलाज, घर के खर्च, बच्चों की जिम्मेदारी बढ़ जाएगी, तब क्या होगा? यही सोचिए और इसी सोच के साथ अपनी पूरी इच्छाशक्ति जुटाकर इस आंदोलन में भाग लीजिए।
1 मई को जंतर-मंतर पर एक ऐसी ज्वाला जलानी है, जो हर कर्मचारी के दिल में पेंशन की लड़ाई की आग को और तेज़ कर दे। यह लड़ाई केवल आज के लिए नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी है। इस लड़ाई को जीतना ही होगा।
हर कर्मचारी को अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। कोई पीछे नहीं रहे। नेता भी आगे आएं। सोशल मीडिया का सही तरीके से इस्तेमाल करें। वीडियो बनाएं, मैसेज भेजें, पोस्टर बनाएं। हर गली, हर मोहल्ले में इस आंदोलन की बात होनी चाहिए। सबको बताइए कि पेंशन हमारा हक है और हम इसे लेकर रहेंगे।
याद रखिए — एकजुटता ही हमारी ताकत है। पेंशन हमारा अधिकार है। हमें मिलकर, एकजुट होकर, बिना डरे, बिना रुके, लगातार लड़ाई लड़नी है। जब तक जीत नहीं मिलती, तब तक लड़ते रहना है। 1 मई 2025 को चलो दिल्ली — जंतर-मंतर पर इतिहास रचने।
पेंशन है बुढ़ापे का सहारा,हर महीने मिलने वाला हमारा।अपने हक के लिए अब लड़ना है,जंतर-मंतर जाकर कहना है।सब मिलकर आवाज़ उठाएँगे,अपना अधिकार वापस लाए
1 मई को सब चल पड़ेंगे,पुरानी पेंशन फिर से लेंगे।
स्कूल चलो मिशन 2025 उत्तर प्रदेश की एक महत्वपूर्ण योजना है, जिसका उद्देश्य यह है कि हर बच्चा स्कूल जाए और पढ़ाई से वंचित न रहे। यह योजना खासकर गरीब, पिछड़े और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है ताकि वे भी शिक्षा का अधिकार पा सकें। यह मिशन उत्तर प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा चलाया जा रहा है और इसका मकसद सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से जोड़ना है।
उत्तर प्रदेश की सरकार यह मानती है कि जब तक हर बच्चा स्कूल नहीं जाएगा, तब तक समाज और देश का विकास अधूरा रहेगा। इसीलिए सरकार ने यह लक्ष्य रखा है कि 2025 तक राज्य का कोई भी बच्चा स्कूल से बाहर न रहे। इसके लिए गांव-गांव और मोहल्लों में जाकर अभिभावकों को जागरूक किया जा रहा है कि वे अपने बच्चों को स्कूल जरूर भेजें। कई जगहों पर शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्राम प्रधानों की मदद से बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया जा रहा है|
स्कूल चलो मिशन 2025 में कई योजनाओं को जोड़ा गया है जिससे बच्चों को स्कूल आने में किसी तरह की परेशानी न हो। बच्चों को मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म, जूते-मोज़े और बैग दिए जा रहे हैं। साथ ही मिड-डे मील योजना के तहत दोपहर का भोजन भी स्कूलों में दिया जा रहा है। इससे गरीब परिवारों के लिए अपने बच्चों को स्कूल भेजना आसान हो गया है क्योंकि अब उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ खाना और जरूरी सामान भी स्कूल से मिल रहा है।
सरकार ने यह भी तय किया है कि जो बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं, उन्हें दोबारा शिक्षा से जोड़ा जाए। इसके लिए विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं। शिक्षक और अधिकारी उन बच्चों के घर जाकर उनसे और उनके माता-पिता से बात करते हैं और उन्हें स्कूल में दाखिला दिलाने का प्रयास करते हैं। खासकर बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि कई बार लड़कियों को घरेलू कामों में लगा दिया जाता है और उनकी पढ़ाई छूट जाती है। अब सरकार लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए भी विशेष योजनाएं बना रही है।
स्कूल चलो मिशन के तहत सभी स्कूलों में नामांकन अभियान चलाया गया है। इसमें बच्चों को स्कूल में दाखिला लेने के लिए प्रेरित किया जाता है और हर बच्चे की जानकारी दर्ज की जाती है। अगर कोई बच्चा स्कूल से गायब होता है या नहीं आता, तो उसके बारे में जांच की जाती है और उसे वापस स्कूल लाने की कोशिश की जाती है। शिक्षकों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे अपने क्षेत्र के सभी बच्चों की जानकारी रखें और सुनिश्चित करें कि कोई भी बच्चा पढ़ाई से वंचित न रहे।
इस योजना में तकनीक का भी उपयोग किया जा रहा है। कई स्कूलों में अब डिजिटल हाजिरी की जा रही है जिससे यह पता चलता है कि कितने बच्चे नियमित रूप से स्कूल आ रहे हैं। साथ ही शिक्षा विभाग एक ऐप के माध्यम से हर स्कूल की जानकारी इकट्ठा कर रहा है ताकि योजना को सफल बनाया जा सके। यह ऐप यह भी दिखाता है कि कहां पर बच्चों की संख्या कम है और कहां पर और काम करने की जरूरत है।
स्कूल चलो मिशन 2025 में पंचायतों, नगर निकायों, शिक्षकों, समाजसेवियों और स्थानीय लोगों की भी मदद ली जा रही है। स्कूल चलो रैलियां, प्रभात फेरियां और जनजागरूकता कार्यक्रम किए जा रहे हैं ताकि लोगों को यह समझाया जा सके कि शिक्षा कितनी जरूरी है। छोटे-छोटे बच्चे हाथों में तख्तियां लेकर जब गांवों में निकलते हैं और नारे लगाते हैं "पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया", तो लोगों का ध्यान इस ओर जाता है और वे भी अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देने लगते हैं।
सरकार यह भी चाहती है कि सरकारी स्कूलों की छवि सुधरे ताकि माता-पिता अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों के बजाय सरकारी स्कूलों में भेजने को तैयार हों। इसके लिए स्कूलों की इमारतें सुधारी जा रही हैं, शौचालय बनवाए जा रहे हैं, पीने का साफ पानी उपलब्ध कराया जा रहा है और कंप्यूटर शिक्षा की सुविधा भी दी जा रही है। जब स्कूल अच्छा और साफ-सुथरा होगा, तो बच्चे भी वहां जाना पसंद करेंगे और पढ़ाई में रुचि लेंगे।
स्कूल चलो मिशन में शिक्षा के साथ-साथ बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है। खेल-कूद, चित्रकला, गायन, नृत्य और अन्य गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ अपनी रुचियों को भी पहचान सकें। शिक्षकों को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि वे बच्चों को प्यार और स्नेह से पढ़ाएं ताकि बच्चा स्कूल आने से डरे नहीं बल्कि खुशी से आए।
यह मिशन केवल सरकार का नहीं, बल्कि हम सबका है। जब तक हर माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेजेंगे, तब तक यह मिशन सफल नहीं हो सकता। समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा और शिक्षा के इस अभियान में योगदान देना होगा। स्कूल चलो मिशन 2025 हमें यह याद दिलाता है कि शिक्षा केवल किताबें पढ़ना नहीं है, बल्कि यह बच्चों का भविष्य है, और एक पढ़ा-लिखा बच्चा ही कल एक अच्छा नागरिक बन सकता है।
बेसिक शिक्षा विभाग का यह प्रयास सराहनीय है कि वह हर साल इस योजना को और मजबूत बना रहा है। पहले जहां स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या अधिक थी, वहीं अब धीरे-धीरे यह संख्या घट रही है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में अब माता-पिता भी शिक्षा के महत्व को समझने लगे हैं। उन्हें यह समझ में आने लगा है कि अगर उनके बच्चे पढ़-लिख जाएंगे तो वे एक अच्छा जीवन जी पाएंगे।
अभी भी कुछ चुनौतियाँ हैं, जैसे कुछ इलाकों में स्कूल दूर होने के कारण बच्चे नहीं जा पाते, कुछ जगहों पर शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं, तो कहीं स्कूलों में सुविधा कम है। लेकिन सरकार इन सभी समस्याओं को दूर करने की कोशिश कर रही है। नए स्कूल खोले जा रहे हैं, शिक्षक बहाल किए जा रहे हैं और स्कूलों को सुविधाजनक बनाया जा रहा है। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि स्कूलों में बच्चों को सही तरीके से पढ़ाया जाए और उनकी पढ़ाई में कोई कमी न हो।
स्कूल चलो मिशन 2025 का लक्ष्य बड़ा है लेकिन अगर सभी लोग मिलकर प्रयास करें तो यह जरूर सफल हो सकता है। यह मिशन न केवल बच्चों को शिक्षा देगा बल्कि हमारे देश को एक उज्जवल भविष्य भी देगा। जब हर बच्चा पढ़ेगा, तो वह अपने परिवार, गांव और देश के विकास में योगदान देगा। एक पढ़ा-लिखा समाज ही सशक्त समाज बन सकता है।
इसलिए हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने आस-पास के सभी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करेंगे, उनकी मदद करेंगे और इस मिशन को सफल बनाने में अपना योगदान देंगे। स्कूल चलो मिशन 2025 केवल एक योजना नहीं है, यह एक आंदोलन है – शिक्षा का आंदोलन, भविष्य निर्माण का आंदोलन। आइए हम सब मिलकर इस मिशन को सफल बनाएं और उत्तर प्रदेश को शिक्षा के क्षेत्र में एक आदर्श राज्य बनाएं।
हीट वेव से बच्चों की सुरक्षा को लेकर स्कूलों में एडवाइजरी, ओआरएस, पानी और पंखे की व्यवस्था के निर्देश
कानपुर देहात ज़िले में इन दिनों गर्मी अपना रौद्र रूप दिखा रही है। अप्रैल महीने में ही तापमान इतना बढ़ गया है कि लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है। ऐसी भीषण गर्मी में बच्चों की सुरक्षा के लिए बेसिक शिक्षा विभाग ने एक अहम कदम उठाया है। विभाग ने हीट वेव यानी लू से बचाव के लिए एडवाइजरी जारी की है। इस एडवाइजरी में स्कूलों के प्रधानाचार्यों और अध्यापकों को कई ज़रूरी निर्देश दिए गए हैं, ताकि बच्चे इस खतरनाक गर्मी में सुरक्षित रह सकें। स्कूलों में पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों का स्वास्थ्य भी ज़रूरी है। इसलिए गर्मी में बच्चों को हीट वेव से बचाने के लिए आपदा प्रबंधन के तहत बेसिक शिक्षा विभाग ने पूरी तैयारी कर ली है।
गर्मी के मौसम में सबसे बड़ी परेशानी बिजली और पानी की होती है। अगर स्कूलों में बिजली चली जाए और पानी की सप्लाई न हो तो बच्चों को दिक्कत हो सकती है। इसी को ध्यान में रखते हुए विभाग ने निर्देश दिया है कि स्कूलों में बिजली की व्यवस्था दुरुस्त रहे और पानी की सप्लाई लगातार बनी रहे। इसके अलावा हर क्लासरूम में पंखे सही हालत में काम करते रहें, इसका भी ध्यान रखना ज़रूरी है। सभी स्कूलों को कहा गया है कि वे कमरों को ठंडा और आरामदायक बनाए रखें।
गर्मी में खुले में खेलना या किसी भी प्रकार की गतिविधि करना बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है। तेज़ धूप और हीट वेव में बच्चे बीमार पड़ सकते हैं। इसलिए स्कूलों को सख्त आदेश दिए गए हैं कि बच्चों से कोई भी शारीरिक गतिविधि, जैसे दौड़, खेलकूद या पीटी न कराई जाए। बच्चों को धूप में न भेजा जाए और न ही प्रार्थना सभा जैसी गतिविधियां खुले में कराई जाएं। सभी गतिविधियां कमरे के अंदर ही कराई जाएं।
सिर्फ यही नहीं, बच्चों और उनके अभिभावकों को भी गर्मी से बचाव के तरीके बताए जाएंगे। इसके लिए स्कूलों में आपदा प्रबंधन पर आधारित फिल्में दिखाई जाएंगी। इन फिल्मों के ज़रिए बच्चों और उनके परिवारों को बताया जाएगा कि गर्मी के मौसम में कैसे खुद को सुरक्षित रखें। कौन-कौन से उपाय करें ताकि हीट वेव से बचा जा सके। जैसे — घर से बाहर न निकलना, धूप में छाता या टोपी लगाना, हल्के और सूती कपड़े पहनना, ठंडा पानी पीना और ओआरएस घोल का सेवन करना।
ओआरएस यानी ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन गर्मी में बहुत फायदेमंद होता है। इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होती और लू लगने का खतरा कम होता है। स्कूलों को आदेश दिए गए हैं कि वे बच्चों के लिए ओआरएस और इलेक्ट्राल के पैकेट का इंतज़ाम करें। अगर किसी बच्चे को चक्कर आए या वह कमजोर महसूस करे तो उसे तुरंत ओआरएस का घोल दिया जाए।
बेसिक शिक्षा अधिकारी अजय कुमार मिश्रा ने बताया कि सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को यह निर्देश जारी कर दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्र के स्कूलों में व्यवस्थाएं दुरुस्त कराएं। पेयजल की व्यवस्था लगातार बनी रहे, बिजली की सप्लाई में कोई रुकावट न आए और पंखे पूरी तरह सही हालत में चलें। अगर गर्मी और बढ़ती है तो स्कूल समय में भी परिवर्तन किया जाएगा। मतलब यह कि स्कूल का समय घटाकर सुबह जल्दी या दिन में जल्दी छुट्टी कर दी जाएगी, ताकि बच्चे दोपहर की तेज़ धूप में घर न जाएं।
गर्मी में बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी होता है। छोटे बच्चों की त्वचा और शरीर जल्दी गर्मी पकड़ लेते हैं। उन्हें जल्दी पसीना आता है और कमजोरी महसूस होती है। अगर सही देखभाल न की जाए तो बच्चे हीट स्ट्रोक का शिकार भी हो सकते हैं। इसलिए विद्यालयों को कहा गया है कि वे हर हाल में बच्चों के लिए बिजली, पानी और पंखे की व्यवस्था बनाए रखें। अगर कहीं कोई समस्या आती है तो तुरंत संबंधित विभाग को सूचना दें।
विद्यालयों में जलपान के समय भी ध्यान रखने की ज़रूरत है। बच्चों को ठंडा और साफ पानी मिलना चाहिए। ज्यादा मीठे, भारी और तले-भुने खाद्य पदार्थ न दिए जाएं। बच्चों को हल्का भोजन और फलों का सेवन करने के लिए प्रेरित किया जाए। अगर कोई बच्चा बीमार लगे तो उसकी सूचना उसके अभिभावकों को तुरंत दें। गर्मी के मौसम में वायरल बुखार, डायरिया और हीट स्ट्रोक जैसी बीमारियां तेजी से फैलती हैं।
इसी वजह से यह भी तय किया गया है कि विद्यालय परिसर में स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाए। पानी के टैंकों को साफ कराकर ही पानी भरवाया जाए। बच्चों को साफ-सुथरे गिलास और बर्तनों में पानी पिलाया जाए। कहीं भी गंदा पानी या कीचड़ जमा न होने दिया जाए। इससे मच्छर और कीड़े-मकोड़े भी पनपते हैं जो और बीमारियां फैला सकते हैं।
हीट वेव के दौरान बच्चों के पहनावे का भी ध्यान रखना चाहिए। उन्हें सूती और हल्के रंग के कपड़े पहनने चाहिए। गहरे रंग के कपड़े जल्दी गर्मी पकड़ते हैं। बच्चों को टोपी या रूमाल से सिर ढकने के लिए कहा जाए। अगर स्कूल वर्दी में बदलाव करना संभव हो तो गर्मी के मौसम में हल्की और आरामदायक वर्दी की अनुमति दी जाए।
स्कूलों में सुबह की प्रार्थना सभा भी अब कमरों के अंदर ही कराई जाए या पूरी तरह से स्थगित कर दी जाए। बच्चों को लंबी कतार में खड़ा न कराया जाए। अगर बहुत ज़रूरी हो तो छायादार जगह पर, बहुत कम समय के लिए ही प्रार्थना कराई जाए।
अभिभावकों को भी जागरूक करने की ज़रूरत है। स्कूलों की तरफ से पत्र भेजकर या अभिभावक बैठक के ज़रिए उन्हें बताया जाए कि वे गर्मी के मौसम में अपने बच्चों का कैसे ध्यान रखें। बच्चों को समय पर स्कूल भेजें और दोपहर की छुट्टी के बाद सीधे घर ले जाएं। बच्चों को घर में ज्यादा देर धूप में खेलने न दें।
हीट वेव के समय बच्चों के खानपान का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। बच्चों को ताजे फल, खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूजा जैसी चीजें खिलाई जाएं। बासी खाना, तली-भुनी चीजें और कोल्ड ड्रिंक से बचें। अगर बच्चा बाहर से खेलकर आया हो तो उसे तुरंत ठंडा पानी या ओआरएस का घोल पिलाएं।
हीट वेव के दौरान लू से बचाव के उपाय बच्चों को बार-बार समझाने चाहिए। जैसे — तेज़ धूप में बाहर न जाएं, छाया में रहें, सिर पर टोपी या गीला कपड़ा रखें, पानी बार-बार पिएं और बहुत जरूरी हो तभी घर से बाहर निकलें।
बेसिक शिक्षा विभाग का यह कदम बच्चों की सुरक्षा के लिए बहुत सराहनीय है। अगर सभी स्कूल इन निर्देशों का पालन करें और अभिभावक भी सतर्क रहें तो गर्मी के मौसम में बच्चों को लू और अन्य बीमारियों से बचाया जा सकता है। विद्यालय प्रधान, अध्यापक और कर्मचारी सभी मिलकर इस जिम्मेदारी को निभाएं तो हीट वेव का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।
अगर कहीं स्कूल में इन निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है तो वहां के खंड शिक्षा अधिकारी को सूचित किया जाए। बच्चों के स्वास्थ्य के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। गर्मी का मौसम अभी और तेज़ होगा। ऐसे में बच्चों को सुरक्षित रखना हम सभी की ज़िम्मेदारी है। विद्यालयों में समय-समय पर निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी व्यवस्थाएं ठीक हैं या नहीं।
इस तरह की सावधानी और सजगता से ही हम अपने नौनिहालों को भीषण गर्मी में सुरक्षित रख सकते हैं। बेसिक शिक्षा विभाग की यह पहल समय की मांग है और इसका पालन हर विद्यालय को सख्ती से करना चाहिए। बच्चे ही हमारे भविष्य हैं और उनका स्वास्थ्य ही देश की असली संपत्ति है|
👉हीट-वेव से बचाव हेतु बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा निर्गत एडवाइजरी व आवश्यक कार्यवाही कराये जाने के संबंध में
https://www.updatemarts.com/2025/04/blog-post_279.html
अमेठी जिले ने शिक्षा के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम की है। निपुण अस्सेस्मेंट टेस्ट 2024-25 में अमेठी ने प्रदेश भर में पहला स्थान हासिल किया है। यह उपलब्धि जिले के शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों की मेहनत का परिणाम है। पिछले सत्र 2022-23 में अमेठी जिले ने 59वां स्थान प्राप्त किया था, लेकिन इस बार जिले ने ऐतिहासिक छलांग लगाते हुए पहला स्थान हासिल किया।
इस सत्र में अमेठी जिले के कुल 1600 स्कूलों के 133410 बच्चों ने निपुण अस्सेस्मेंट टेस्ट में भाग लिया। इस बार जिले का प्रदर्शन पिछले वर्ष से काफी बेहतर रहा। पिछले सत्र में अमेठी का प्रतिशत 68.01 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 96.4 प्रतिशत हो गया है। यह एक बड़ा सुधार है और इसका श्रेय शिक्षकों की निरंतर मेहनत और बच्चों की लगन को जाता है।
ग्रेड ए में आने वाले बच्चों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। पिछले सत्र में 23.01 प्रतिशत बच्चे ग्रेड ए में थे, जबकि इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 53.04 प्रतिशत तक पहुँच गया है। यह दिखाता है कि बच्चों ने बेहतर प्रदर्शन किया है और उनकी मेहनत का फल उन्हें मिल रहा है।
इस बार प्रदेश स्तर पर हमीरपुर ने दूसरा स्थान प्राप्त किया और हापुड़ ने तीसरा स्थान हासिल किया। पिछली बार अमेठी ने 42वां स्थान प्राप्त किया था, जबकि इस बार उसने एक ऐतिहासिक छलांग लगाई और पहले स्थान पर पहुँच गया। यह बदलाव जिले के शैक्षिक माहौल में सुधार का संकेत है।
हालांकि, कुछ जिले इस बार पिछड़ गए हैं। अयोध्या जिला इस बार 64वें स्थान पर लुड़क गया है, जबकि सुल्तानपुर भी पिछली बार की 17वीं रैंक से फिसलकर 62वें स्थान पर पहुँच गया है। यह साबित करता है कि शैक्षिक गुणवत्ता में निरंतर सुधार की आवश्यकता है और यह किसी एक साल की मेहनत से नहीं हो सकता, बल्कि इसे निरंतर बनाए रखना होता है।
अमेठी जिले की यह सफलता केवल बच्चों की मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि शिक्षकों के निरंतर प्रशिक्षण, स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण और अभिभावकों के सहयोग का भी परिणाम है। शिक्षकों को लगातार प्रशिक्षण दिया गया, जिससे वे बच्चों के लिए बेहतर शिक्षण पद्धतियाँ अपना सके। इसके अलावा, विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षण की प्रक्रिया को लागू किया गया, जिसका परिणाम आज हम देख रहे हैं।
आने वाले समय में इस सफलता को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास किए जाएंगे। अमेठी जिले के शिक्षा विभाग ने यह संकल्प लिया है कि बच्चों की शिक्षा में सुधार और गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए निरंतर मेहनत की जाएगी। शिक्षकों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ उनके काम की निगरानी भी की जाएगी, ताकि बच्चों की पढ़ाई में कोई कमी न रहे।
अमेठी की इस सफलता से अन्य जिलों को भी प्रेरणा मिलनी चाहिए। यह दिखाता है कि अगर समर्पण, मेहनत और सही मार्गदर्शन हो, तो किसी भी जिले को उच्च स्थान प्राप्त किया जा सकता है। यह सफलता जिले के सभी शिक्षा अधिकारियों, शिक्षकों और अभिभावकों के सामूहिक प्रयास का परिणाम है।
अब अमेठी जिले को इस सफलता को बनाए रखते हुए और भी बेहतर करने की चुनौती मिलेगी। बच्चों की शिक्षा में सुधार, शिक्षकों की गुणवत्ता और स्कूलों में सुविधाओं का सुधार अब अमेठी के लिए प्राथमिकता बनेगा। जिले को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों का प्रदर्शन इस स्तर पर बनाए रखा जाए और आगे और भी अच्छे परिणाम प्राप्त किए जाएं।
इस सफलता के बाद अब अमेठी जिले में शिक्षा का माहौल और भी बेहतर होगा। बच्चों को अब और भी अच्छे शिक्षक मिलेंगे, उनके लिए बेहतर सुविधाएँ होंगी और वे शिक्षा के क्षेत्र में और भी ऊँचाइयाँ छू सकेंगे। यह एक नई शुरुआत है, जो जिले की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है।
अमेठी की सफलता से यह भी सीखने को मिलता है कि शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए केवल बच्चों की मेहनत ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की मेहनत और निरंतर प्रशिक्षण भी जरूरी है। जब शिक्षक बच्चों के लिए बेहतर तरीकों से पढ़ाते हैं और बच्चों में पढ़ाई के प्रति उत्साह होता है, तो अच्छा परिणाम आता है।
इस सफलता को देखकर अन्य जिलों को भी यह प्रेरणा मिलनी चाहिए कि वे भी अपनी शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाकर अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं। अगर हर जिला अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए काम करे, तो देशभर में शिक्षा का स्तर ऊँचा हो सकता है और बच्चों का भविष्य उज्जवल हो सकता है।
अमेठी जिले की यह सफलता एक प्रेरणा है, जो यह साबित करती है कि अगर सही दिशा में काम किया जाए और सभी लोग मिलकर प्रयास करें, तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
👉वित्तीय वर्ष 2025-26 में आयकर अग्रिम कटौती वेतन से प्रति माह किये जाने के सम्बन्ध में
https://www.updatemarts.com/2025/04/2025-26_16.html
ए.आर.पी. को औचक निरीक्षण एवं निरीक्षण पंजिका में अंकन का अधिकार नहीं
https://www.updatemarts.com/2025/04/blog-post_345.html
कानपुर और उन्नाव के बीच मंगलवार की सुबह एक बेहद दर्दनाक सड़क हादसा हो गया। इस हादसे में तीन महिला शिक्षिकाओं और एक कार चालक की मौके पर ही मौत हो गई। इसके अलावा एक शिक्षक गंभीर रूप से घायल हो गए। यह भयानक हादसा नारामऊ हाईवे कट के पास हुआ। हादसे की खबर जैसे ही आसपास के लोगों और शिक्षा विभाग तक पहुँची, पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
सुबह लगभग 7:30 बजे कल्याणपुर निवासी विशाल द्विवेदी नामक युवक अपनी कार से तीन शिक्षिकाओं को स्कूल छोड़ने उन्नाव की ओर ले जा रहा था। नारामऊ में दलहन रोड के पास हाईवे पर एक सीएनजी पंप है। जैसे ही विशाल अपनी कार को सीएनजी भरवाने के लिए मोड़ने लगे, तभी उनकी कार एक बाइक से टकरा गई। बाइक सवार सरकारी शिक्षक अशोक कुमार, जो पनकी के रहने वाले हैं, इस टक्कर में गंभीर रूप से घायल हो गए।
इस टक्कर के तुरंत बाद सामने से आ रही एक प्राइवेट ट्रैवल्स की बस ने कार को जोरदार टक्कर मार दी। बस की टक्कर इतनी तेज थी कि कार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। कार में सवार सभी लोग कार के अंदर बुरी तरह फंस गए। राहगीरों और बिठूर पुलिस ने कड़ी मशक्कत के बाद कार में फंसे लोगों को बाहर निकाला।
कार में कुल चार लोग सवार थे। इनमें आकांक्षा मिश्रा, अंजुला मिश्रा, ऋचा अग्निहोत्री और कार चालक विशाल द्विवेदी शामिल थे। हादसे के बाद आकांक्षा मिश्रा और अंजुला मिश्रा को हैलेट अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। विशाल द्विवेदी ने भी इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। शुरू में यह सूचना भी आई कि ऋचा अग्निहोत्री की भी मृत्यु हो गई है, लेकिन बाद में यह खबर गलत साबित हुई।
ऋचा अग्निहोत्री फिलहाल रामा अस्पताल के आईसीयू में भर्ती हैं। वो होश में हैं, बात कर रही हैं और अपने परिजनों को पहचान भी रही हैं। उनके पेट में गंभीर अंदरूनी चोटें हैं। डॉक्टरों ने बताया है कि अगर ब्लीडिंग नहीं हो रही है, तो वो पूरी तरह ठीक हो सकती हैं। अगर सीटी स्कैन में किसी गंभीर स्थिति का पता चलता है, तो ऑपरेशन कर उनकी तिल्ली निकालनी पड़ सकती है। उनके हाथ, पैर और गले में भी काफी चोटें आई हैं और उन पर प्लास्टर चढ़ाया गया है। उनके परिजन और शिक्षा विभाग के लोग लगातार उनके स्वास्थ्य की जानकारी ले रहे हैं। सभी लोग ईश्वर से प्रार्थना कर रहे हैं कि उनकी सीटी स्कैन रिपोर्ट ठीक आए और वो जल्द से जल्द स्वस्थ होकर घर लौटें।
बाइक सवार अशोक कुमार का भी इलाज रामा अस्पताल में चल रहा है। उनकी हालत भी गंभीर बनी हुई है। इस हादसे की खबर मिलते ही परिजनों में कोहराम मच गया। परिजन अस्पताल पहुँचते ही फूट-फूट कर रोने लगे। वहीं शिक्षा विभाग में भी शोक की लहर फैल गई।
एनएचएआई की टीम ने घटनास्थल पर पहुँच कर क्षतिग्रस्त वाहनों को हटवाया और ट्रैफिक को सामान्य कराया। पुलिस ने शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मामले की जाँच शुरू कर दी। इस दुर्घटना में जिन शिक्षिकाओं की मृत्यु हुई, वे कंपोजिट स्कूल जमाल नगर सफीपुर में कार्यरत थीं। इसके अलावा अर्चना नाम की एक और शिक्षिका, जो विद्यालय न्यामतपुर में कार्यरत हैं, की हालत भी गंभीर बताई गई थी। आकांक्षा मिश्रा का भी मौके पर ही निधन हो गया था।
घटना के समय वहां मौजूद राहगीरों ने बताया कि कार पहले बाइक से टकराई और फिर बस से जा भिड़ी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि कार के परखच्चे उड़ गए। हादसे के बाद राहगीरों और पुलिस ने कड़ी मशक्कत कर कार में फंसे लोगों को बाहर निकाला।
हादसे के बाद एक और दुखद बात यह रही कि एम्बुलेंस काफी देर से पहुँची। अगर एम्बुलेंस समय पर पहुँच जाती तो शायद कुछ लोगों की जान बचाई जा सकती थी। इस हादसे ने पूरे कानपुर और उन्नाव को गहरे दुख में डुबो दिया। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने शोक व्यक्त किया और कहा कि सड़क सुरक्षा नियमों का पालन करना बहुत ज़रूरी है।
हादसे का सबसे बड़ा कारण हाईवे कट पर अचानक मोड़ लेना और सावधानी में कमी को माना जा रहा है। ऐसे हाईवे कट पर हमेशा दुर्घटनाओं का खतरा ज्यादा रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि हाईवे पर कट बनाते समय विशेष ध्यान देना चाहिए। सीएनजी पंप के सामने कट नहीं होना चाहिए और वहाँ ट्रैफिक सिग्नल व रिफ्लेक्टर लगाए जाने चाहिए। साथ ही बस और भारी वाहन चालकों को भी हाईवे पर धीमी गति से गाड़ी चलानी चाहिए।
इस हादसे से सभी को यह सीख लेनी चाहिए कि कभी भी हाईवे पर अचानक मोड़ नहीं लेना चाहिए। बाइक और कार को आगे-पीछे चलाते समय उचित दूरी बनाए रखनी चाहिए। एम्बुलेंस और पुलिस को घटनास्थल पर समय से पहुँचना चाहिए। सरकारी स्तर पर भी सड़क सुरक्षा के उपाय मजबूत करने चाहिए ताकि इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों।
ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्माओं को शांति प्रदान करें और घायल शिक्षक व शिक्षिका को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ दे। उनके परिजनों को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति दें। यह हादसा पूरे समाज के लिए एक चेतावनी है कि हम सभी को सड़क सुरक्षा के नियमों का पालन करना चाहिए और दूसरों की सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।
गर्मी का मौसम हर साल आता है। सूरज बहुत तेज़ चमकता है, ज़मीन तपने लगती है और लू चलने लगती है। ऐसे में हम सबको बहुत प्यास लगती है, बार-बार ठंडा पानी पीने का मन करता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे आसपास जो पक्षी रहते हैं, वो इस गर्मी में क्या करते होंगे?
जैसे हम इंसान गर्मी में परेशान हो जाते हैं, वैसे ही गौरैया, बुलबुल, मैना, कबूतर जैसे पक्षी भी बहुत परेशान होते हैं। उन्हें भी प्यास लगती है, लेकिन वो तो दुकानों से पानी की बोतल नहीं खरीद सकते। वो तो सिर्फ वही पानी पी सकते हैं जो उन्हें आस-पास कहीं मिल जाए — जैसे कोई तालाब, पेड़ के नीचे का गड्ढा या कोई साफ बर्तन।
आजकल शहरों में तालाब और झीलें बहुत कम हो गई हैं। पेड़ों की संख्या भी घट गई है। ऊपर से गर्मी में जो थोड़े बहुत जलस्रोत होते हैं, वो भी सूख जाते हैं। इसलिए पक्षियों को बहुत मुश्किल होती है।
क्या आपने गौर किया है कि अब आपके घर की बालकनी या आँगन में पहले जितने पक्षी आते थे, उतने अब नहीं आते? गौरैया, जो कभी हर घर की पहचान हुआ करती थी, अब बहुत कम दिखती है।
इसके कई कारण हैं। हमने अपने घरों में उनके लिए पानी और दाना रखना बंद कर दिया। पेड़ काट दिए, जहाँ वो बैठा करती थीं या घोंसला बनाती थीं। मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों से भी उन्हें नुकसान पहुँचता है। और सबसे बड़ी बात — हमने उनके लिए समय और ध्यान देना छोड़ दिया।
गर्मी के दिनों में तापमान 40 डिग्री से भी ऊपर चला जाता है। ऐसे में पानी की कमी बहुत बढ़ जाती है। पक्षी इधर-उधर उड़ते हैं, लेकिन जब कहीं भी पानी नहीं मिलता तो कई बार वो प्यास से मर भी जाते हैं।
अब सोचिए, अगर हम सब अपने घर की बालकनी, खिड़की, आँगन या छत पर एक छोटा सा बर्तन रख दें, जिसमें साफ पानी हो — तो कितने पक्षियों की जान बच सकती है। ये एक बहुत छोटा काम है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा होता है।
पानी के साथ-साथ अगर हम कुछ दाना भी रख दें — जैसे चावल, बाजरा, ज्वार या टूटे हुए गेहूं — तो पक्षियों को पीने के बाद खाने को भी मिल जाएगा। गर्मी में दाना ढूंढना भी मुश्किल हो जाता है। ज़मीन सूख जाती है, खेतों में फसल नहीं होती। ऐसे में हमारी मदद उनके लिए एक पूरा भोजन बन जाती है।
इसके लिए बर्तन का चुनाव भी ध्यान से करना चाहिए। मिट्टी, स्टील या सिरेमिक के बर्तन सबसे अच्छे होते हैं क्योंकि ये पानी को ठंडा रखते हैं। प्लास्टिक के बर्तन बहुत गरम हो जाते हैं, इसलिए उन्हें न रखें।
हर दो-तीन दिन में बर्तन को अच्छे से धोना चाहिए और उसमें ताज़ा पानी भरना चाहिए, ताकि पानी दूषित न हो और पक्षियों को कोई बीमारी न हो।
बर्तन को ऐसी जगह रखें जहाँ धूप सीधी न पड़े और पक्षी आराम से बैठ सकें — जैसे छत का कोना, बालकनी, खिड़की की मुंडेर या आँगन का कोई कोना।
थोड़ा सा दाना रोज़ रखना चाहिए। इसे ज़मीन पर या किसी तश्तरी में फैलाकर रख सकते हैं ताकि पक्षी आराम से चुग सकें। अगर घर में पेड़ हैं, तो वहाँ पानी रख सकते हैं ताकि पक्षी शाखाओं पर बैठकर आराम से पानी पी सकें।
कुछ लोग सोचते हैं कि यह सेवा या दान है, लेकिन यह तो संवेदना है, यानी दिल से जुड़ा हुआ एक अच्छा काम। हम सब एक ही धरती पर रहते हैं — इंसान, जानवर, पक्षी और पेड़-पौधे। अगर हम अपने आस-पास के जीवों का ध्यान नहीं रखेंगे, तो यह धरती सूनी और बेरंग हो जाएगी।
बच्चे इस काम में बहुत आगे आ सकते हैं। स्कूलों में पोस्टर बनाकर या ड्रॉइंग बनाकर इस विषय को दिखाया जा सकता है। स्कूल में भी पक्षियों के लिए पानी रखने की जगह बनाई जा सकती है। बच्चे आपस में मिलकर एक बर्ड-फीडिंग टीम भी बना सकते हैं। इससे उनमें प्रकृति से जुड़ाव और जिम्मेदारी की भावना आएगी।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी और कम होते जलस्रोतों की वजह से पक्षियों की संख्या घट रही है। उनकी प्रजनन दर यानी बच्चे पैदा करने की क्षमता भी कम हो गई है। गौरैया जैसे पक्षी अब शहरों में घोंसले नहीं बना पा रहे क्योंकि उन्हें न तो जगह मिलती है, न भोजन और न पानी।
अगर एक बच्चा भी एक प्याला पानी रखे, और फिर उसके दोस्त, परिवार वाले और पड़ोसी भी ऐसा करें — तो यह एक बड़ा बदलाव ला सकता है। सोचिए अगर हर गली, हर स्कूल, हर कॉलोनी में परिंदों के लिए पानी हो — तो कितनी ज़िंदगियाँ बच सकती हैं। यह एक अभियान बन सकता है — "हर घर एक प्याला पानी"।
गर्मी हर साल आती है, और हर साल कुछ पक्षी प्यास से तड़प जाते हैं। लेकिन इस बार, हम कुछ अलग और अच्छा कर सकते हैं। हम एक प्याला पानी रखकर किसी परिंदे की जान बचा सकते हैं।
तो आइए, आज से ही यह काम शुरू करें। अपने घर में एक बर्तन रखें। रोज़ उसमें ताज़ा पानी भरें। थोड़ा दाना भी डालें। और सबसे ज़रूरी — दूसरों को भी प्रेरित करें।
पक्षियों की चहचहाहट फिर से लौटेगी — बस ज़रूरत है हमारी एक कोशिश की|
पक्षियों की प्यास
गर्मी आई, सूरज तेज़,
पक्षी बेचारे हो गए फेल।
ना तालाब, ना पानी की धार,
प्यासे उड़ते बार-बार।
गौरैया जो चहकती थी,
अब वो भी कम दिखती है।
मैना, कबूतर, बुलबुल प्यारे,
ढूंढें पानी सारे दिन हमारे।
प्यास से जब गला सूखता है,
पंख भी उड़ने से रुकता है।
पर अगर हम थोड़ा ध्यान दें,
तो इनका जीवन आसान बनें।
रखें एक प्याला साफ़ जल,
बालकनी या छत पर हर पल।
साथ में थोड़ा दाना भी हो,
परिंदों को खाना भी तो दो!
मिट्टी या स्टील का हो बर्तन,
हर दिन बदलें उसमें जल।
पेड़ के नीचे, कोने में रखें,
जहाँ परिंदे आराम से बैठें।
छोटी सी यह मदद हमारी,
बन जाए इनके लिए प्यारी।
हम सबका है ये संसार,
पक्षी भी हैं इसका अंग समान।
तो आओ मिलकर काम करें,
हर घर में एक प्याला धरें।
गर्मी में न कोई प्यासा हो,
हर पंख खुशहाल और हँसा हो।
रिया की मौत से उठे सवाल: क्या शिक्षा अब व्यापार बन गई है? पढ़ें एक दर्दनाक सच्चाई जो हर दिल को झकझोर देगी।
• रिया की मौत एक सवाल है हम सबके लिए—क्या हमारे देश में गरीब बच्चों को शिक्षा का हक नहीं? पढ़ें दिल छू लेने वाली कहानी।
• क्या शिक्षा अब अमीरों की जागीर बन गई है? रिया की दर्दनाक कहानी आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।
• एक मासूम की जान गई सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके पास फीस नहीं थी—क्या यही है हमारा शिक्षा तंत्र?
• रिया चली गई, पर छोड़ गई सवाल—क्या गरीब होना अब गुनाह है? पढ़ें एक सच्ची और झकझोर देने वाली कहानी।
रिया अब कभी स्कूल नहीं जाएगी...
ये कहानी एक बच्ची की है। बिल्कुल हमारी और आपकी तरह। उसका नाम था रिया प्रजापति। वो उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की रहने वाली थी और 9वीं कक्षा में पढ़ती थी।
रिया पढ़ने में अच्छी थी, सपने देखती थी कि बड़ी होकर कुछ बन पाएगी। लेकिन उसके स्कूल ने उससे एक गलती कर दी… नहीं, गलती नहीं… बहुत बड़ा जुल्म।
उसकी स्कूल की फीस थोड़ी बाकी रह गई थी। इसलिए स्कूल वालों ने उसे परीक्षा देने से रोक दिया और सबके सामने अपमानित किया।
रिया बहुत दुखी हुई। इतना दुखी कि उसने अपनी जान ही दे दी…
अब सोचिए, क्या सिर्फ पैसे न होने की वजह से किसी बच्चे को पढ़ने से रोका जाना चाहिए?
हम सब स्कूल जाते हैं, पढ़ते हैं, सपने देखते हैं। लेकिन अगर किसी के पास पैसे न हों तो क्या वो स्कूल नहीं जा सकता?
हम कहते हैं कि "शिक्षा सबका हक है," लेकिन क्या वाकई ऐसा है?
क्या यही है हमारी नई शिक्षा नीति?
आज हम चाँद तक पहुंच गए हैं, मोबाइल और कंप्यूटर सब कुछ डिजिटल हो गया है। लेकिन गरीब बच्चों के लिए स्कूल जाना अब भी बहुत मुश्किल है।
कई प्राइवेट स्कूल शिक्षा को "बिज़नेस" बना चुके हैं।
• फीस बहुत ज्यादा होती है
• बिल्डिंग चार्ज, यूनिफॉर्म, किताबों के नाम पर पैसे लिए जाते हैं
• और अगर कोई बच्चा पैसे न दे पाए, तो उसे सबके सामने शर्मिंदा किया जाता है।
क्या ये सही है?
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रिया चली गई… लेकिन सवाल छोड़ गई
रिया अब हमारे बीच नहीं है। लेकिन उसकी कहानी हम सबको एक बात सिखाती है—हर बच्चे को पढ़ने का हक है, चाहे वो अमीर हो या गरीब।
कई बच्चे अभी भी चुप हैं, डर के मारे कुछ कह नहीं पाते। लेकिन हमें आवाज़ उठानी चाहिए।
क्योंकि अगली रिया कोई और नहीं… हमारे घर की भी हो सकती है।
हम क्या कर सकते हैं?
• अपने स्कूल में अगर कोई बच्चा परेशान हो रहा है, तो उसकी मदद करें।
• फीस या ड्रेस की वजह से अगर कोई बच्चा रो रहा हो, तो टीचर्स या पैरेंट्स से बात करें।
• और सबसे जरूरी—कभी किसी का मज़ाक न उड़ाएं, बल्कि साथ दें
हम मिलकर रिया जैसी कई ज़िंदगियों को बचा सकते हैं।
रिया की दर्दनाक कहानी बताती है कि हर बच्चे को शिक्षा का हक चाहिए, न कि अपमान। आइए, बदलाव की शुरुआत करें।
क्या वाकई प्राइवेट स्कूल ही हैं बेहतर? जानिए सरकारी स्कूल की असली ताकत और बचत का गणित !
आज के समय में हर माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि अच्छी शिक्षा सिर्फ प्राइवेट स्कूलों में ही मिले। आइए एक नज़र डालें कि प्राइवेट स्कूलों में प्रवेश लेने से पहले आपको किन खर्चों पर ध्यान देना चाहिए:
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प्राइवेट स्कूल की औसत वार्षिक लागत:
खर्च का प्रकार अनुमानित राशि
स्कूल फीस (प्रति वर्ष) ₹12,000 - ₹36,000
बस किराया ₹12,000
परीक्षा शुल्क ₹1,000
यूनिफॉर्म, टाई, बेल्ट आदि ₹1,000
किताबें ₹2,000
स्टेशनरी ₹3,000
टिफिन (₹20 प्रति दिन) ₹6,000
अन्य खर्चे ₹4,000
कुल वार्षिक खर्च ₹41,000
👉 14 साल में कुल खर्च: ₹5,74,000
👉 अगर 2 बच्चे हैं: ₹11,48,000 और नौकरी की कोई गारंटी नहीं!
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👉 अब जानिए सरकारी विद्यालयों की सुविधाएं:
✅ कोई शुल्क नहीं
✅ दो जोड़ी यूनिफॉर्म फ्री
✅ किताबें फ्री (अब NCERT)
✅ मिड-डे मील, दूध और फल फ्री
✅ जूते-मोजे, बैग, स्वेटर फ्री
✅ स्मार्ट क्लासेस और प्रोजेक्टर से पढ़ाई
✅ योग्य शिक्षक—B.Ed., TET, Super-TET पास
✅ खेलकूद, लाइब्रेरी, मासिक एसएमसी बैठक
✅ अभिभावकों के साथ सीधा संवाद और निगरानी
✅ नई शिक्षा नीति आधारित, बाल केंद्रित पाठ्यक्रम
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👉 तुलना: प्राइवेट vs सरकारी स्कूल
सुविधा प्राइवेट स्कूल सरकारी स्कूल
फीस ₹41,000+/वर्ष ₹0
किताबें खुद खरीदनी पड़ती हैं फ्री।
मिड-डे मील नहीं हां
ड्रेस, जूते, बैग अलग से खर्च फ्री
शिक्षक कभी प्रशिक्षित नहीं B.Ed./TET पास
डिजिटल क्लास कभी-कभी अब हर स्कूल में
👉 सोचिए, समझिए, फिर फैसला लीजिए।
“अगर आप चाहें, तो प्राइवेट स्कूल की फीस बचाकर हर साल FD कर सकते हैं—14 साल में यह रकम ₹20 लाख से ज़्यादा हो जाएगी!”
👉 अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजें। न सिर्फ शिक्षा मुफ्त है, बल्कि गुणवत्ता और सुविधा दोनों भी शानदार हैं।
👉 अगर आप सहमत हैं, तो इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाएँ।
आप और आपके माता-पिता भी तो सरकारी स्कूल से पढ़कर ही निकले थे... और आज सफल हैं।
प्राइवेट स्कूलों की भारी फीस vs सरकारी स्कूलों की फ्री सुविधाएं—अब सोच-समझकर लें बच्चों की पढ़ाई का फैसला।
यह संदेश हर अभिभावक के लिए है—समझदारी से शिक्षा चुनिए।
शिक्षा की सच्चाई: प्राइवेट स्कूल बनाम सरकारी स्कूल—खर्च, सुविधाएं और अभिभावकों की पसंद……
निजी स्कूलों की लागत
मैं लखनऊ में निजी स्कूलों की अनुमानित वार्षिक लागत की जानकारी जुटा रहा हूँ। इसमें स्कूल फीस, बस किराया, परीक्षा शुल्क, यूनिफॉर्म, किताबें और स्टेशनरी जैसे विभिन्न खर्चों को शामिल किया जाएगा। मेरा लक्ष्य यह समझना है कि अभिभावकों के लिए निजी शिक्षा का वित्तीय बोझ कितना हो सकता है।
सरकारी स्कूलों में मुफ्त सुविधाएँ
उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में मुफ्त मिलने वाली सुविधाओं की पुष्टि करने की प्रक्रिया में हूँ। इनमें दो जोड़ी यूनिफॉर्म, किताबें (एनसीईआरटी), मध्याह्न भोजन, दूध, फल, जूते-मोजे, बैग और स्वेटर शामिल हैं। मैं यह भी जानने की कोशिश कर रहा हूँ कि ये सुविधाएँ कितनी अच्छी गुणवत्ता की हैं और क्या ये सभी सरकारी स्कूलों में उपलब्ध हैं।
स्मार्ट कक्षाएँ और शिक्षक योग्यता
मैं उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में स्मार्ट कक्षाओं और प्रोजेक्टरों की उपलब्धता और उपयोग के बारे में जानकारी एकत्र कर रहा हूँ। साथ ही, मैं सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की योग्यता (बी.एड., टीईटी, सुपर-टीईटी) और उनके प्रशिक्षण के बारे में भी पता लगा रहा हूँ ताकि निजी स्कूलों के शिक्षकों से उनकी तुलना की जा सके।
अन्य सुविधाएँ और नई शिक्षा नीति
सरकारी स्कूलों में खेलकूद की सुविधाओं, पुस्तकालयों और स्कूल प्रबंधन समितियों (एसएमसी) की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हूँ। इसके अतिरिक्त, मैं यह भी देखना चाहता हूँ कि उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों में नई शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत बाल-केंद्रित पाठ्यक्रम को किस हद तक लागू किया गया है।
निजी स्कूलों को प्राथमिकता
मेरा अगला कदम यह पता लगाना है कि लखनऊ में अभिभावक सरकारी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा और सुविधाओं के बावजूद अपने बच्चों को निजी स्कूलों में क्यों भेजना पसंद करते हैं। इसके पीछे संभावित कारण, जैसे शिक्षा की कथित गुणवत्ता, बुनियादी ढाँचा और अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, की जाँच करना चाहता हूँ।
बेसिक स्कूलों का समय बदलने की मांग, संघ ने पेश किया समाधान
उत्तर प्रदेश में तेज़ गर्मी और बच्चों को हीटवेव से बचाने के लिए शिक्षक संगठनों ने परिषदीय स्कूलों का समय बदलने की मांग की है। रास्ट्रीय शक्षिक महासंघ के जिलाध्यक्ष म,अनोज शुक्ल ने कहा कि गर्मी से बच्चों को बचाने के लिए स्कूलों का समय सुबह का रखा जाए।
उन्होंने कहा कि कई जिलों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर पहुंच चुका है और लू भी चलने लगी है। दोपहर के समय बच्चों की सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने यह सुझाव दिया कि प्रदेश भर के कक्षा 1 से 8 तक के स्कूलों का समय बदलकर सुबह 7:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक किया जाए। इसके साथ ही,बच्चों और उनके माता-पिता को गर्मी और लू से बचने के बारे में जागरूक करने की भी अपील की गई है।
शिक्षक संघ ने यह भी कहा कि स्कूलों में जलवायु और मौसम के असर से बचाव के लिए उचित उपाय किए जाएं। बच्चों को हाइड्रेटेड रखने और उन्हें गर्मी से बचाने के लिए स्कूलों में पानी के पर्याप्त इंतजाम होने चाहिए। इसके अलावा, गर्मी की छुट्टियों का समय भी बढ़ाने की मांग की गई है ताकि बच्चों को तेज़ गर्मी से राहत मिल सके।
संघ ने शासन से अपील की है कि बच्चों की सेहत को ध्यान में रखते हुए जल्द ही इस फैसले पर कार्रवाई की जाए।
https://basicshikshakhabar.com/2025/04/b-1736/
गर्मी और लू से बच्चों को बचाने के उपाय……
👉गर्मी और लू से बच्चों को बचाने के लिए कुछ जरूरी सावधानियां अपनानी चाहिए। अगर हम इनका पालन करें, तो बच्चों को गर्मी से होने वाली समस्याओं से बचाया जा सकता है।
👉बच्चों को गर्मी में हमेशा पानी पीने के लिए कहें, क्योंकि पानी की कमी से शरीर कमजोर हो सकता है। हल्के रंग के, ढीले और सूती कपड़े पहनने से बच्चों को गर्मी में आराम मिलता है और पसीना जल्दी सूखता है।
👉बच्चों को बाहर निकलते समय सूरज की तेज़ रोशनी से बचाना बहुत ज़रूरी है। अगर बाहर जाना हो, तो छाता, टोपी या रूमाल का इस्तेमाल करें। गर्मी में बच्चों को ठंडी जगह पर रखना चाहिए। घर के अंदर एसी या पंखे के नीचे रखना सही रहेगा। अगर बाहर जाना जरूरी हो, तो हवादार या छायादार जगहों पर रखें।
👉गर्मी में खाने-पीने की चीज़ें जल्दी खराब हो सकती हैं। बच्चों को ताजे और सुरक्षित खाने का ही ध्यान रखें। गर्मी में ताजे फल और हरी-सब्जियां खिलाएं, जो शरीर को ठंडा रखते हैं।
👉गर्मी में बच्चों को ज्यादा शारीरिक मेहनत से बचाना चाहिए। उन्हें हल्की-फुल्की गतिविधियों के लिए कहें और बाहर खेलने के बजाय घर के अंदर खेलने की सलाह दें।
👉जैसा कि शिक्षक संघ ने कहा है, स्कूलों का समय सुबह में बदलना चाहिए, ताकि बच्चे गर्मी और लू से बच सकें। गर्मी के समय बच्चों के लिए ज्यादा छुट्टियां और शेड्यूल में लचीलापन होना चाहिए, ताकि वे तेज़ गर्मी से सुरक्षित रह सकें।
इन सावधानियों का पालन करने से बच्चों को गर्मी और लू से बचाया जा सकता है और उनका स्वास्थ्य सुरक्षित रहेगा।
लू लगने के लक्षण…
👉लू लगने पर शरीर का तापमान 40°C (104°F) या इससे ज्यादा बढ़ सकता है, जिससे तेज़ बुखार हो सकता है। इस दौरान पसीना आना बंद हो जाता है, जिससे शरीर का तापमान और बढ़ जाता है। व्यक्ति को चक्कर आ सकते हैं और सिर घुमा सा महसूस हो सकता है, जिससे कमजोरी महसूस होती है। कभी-कभी मानसिक उलझन या भ्रम भी हो सकता है, और व्यक्ति को सोचने या समझने में कठिनाई हो सकती है।
👉लू लगने पर त्वचा गर्म और सूखी हो जाती है, क्योंकि पसीना निकलना बंद हो जाता है। व्यक्ति को घबराहट हो सकती है, दिल की धड़कन तेज़ हो सकती है और सांस लेने में मुश्किल हो सकती है। सांसों की गति तेज़ हो सकती है और सांस लेना कठिन हो सकता है। इसके अलावा, उल्टी, मिचली, या पेट में दर्द भी हो सकता है।
👉अगर इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत व्यक्ति को ठंडी जगह पर ले जाएं, पानी पिलाएं और डॉक्टर से संपर्क करें। लू लगने की स्थिति गंभीर हो सकती है, इसलिए जितना जल्दी इलाज किया जाएगा, उतना बेहतर रहेगा।
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